374 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
किया गया है कि यह इतना महत्वपूर्ण मामला नहीं था कि इसे बदला नहीं जा सकता था, लेकिन यह कि समय-समय पर उस युग के अभिमत और पद्धति के अनुसार विभिन्न स्मृतियों में विभिन्न उद्धरण दिए गए हैं। कल ही मैंने उल्लेख किया था कि धर्मशास्त्रों के मामले में उनकी व्याख्या के कुछ नियम हैं उनके सिद्धांतों और विधियों का स्पष्ट रूप से निर्धारण किया गया है। यह निर्धारण किया गया है कि धर्मशास्त्र का निर्वाचन मीमांसा के नियमों को प्रयुक्त करके ही किया जा सकता है। उनके निर्धारण के लिए चौदह स्रोतों का उपयोग करना पड़ता है। इन सबका उल्लेख किया गया है और इसलिए यदि कोई प्रामाणिक रूप से इन बातों को समझना चाहता है तो उसे उस मामले की गहराई तक जाना चाहिए।
लगभग प्रत्येक स्मृति और धर्मशास्त्र में पितृकुल की सात पीढि़यों और मातृकुल की पांच पीढि़यों को सपिण्ड उन्हें छोड़ने का विधान है। किसी ने इसका खण्डन नहीं किया है। यह कहा गया है कि कुछ स्मृतियों में सात और पांच के स्थान पर पांच और तीन का उल्लेख है। मेरा अनुमान है कि इस प्रयोजनार्थ पैथीनसी स्मृति का अध्ययन किया गया है। यह मानते हुए कि सदन के सदस्य इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहते हैं कि क्या स्मृति में पांच और तीन का विधान है, मैं इस मुद्दे को स्पष्ट करने का प्रयास करूंगा। पैथीनसी स्मृति........
उपाध्यक्ष महोदय : मुझे नहीं लगता कि माननीय विधि मंत्री जी इस मामले के बारे में मताग्रही हैं।
डॉ. अम्बेडकर : जब समय आएगा, हम इस पर विचार करेंगे।
पंडित मालवीय : मैं यह सिद्ध करने के लिए केवल एक उदाहरण दे रहा हूँ कि किस प्रकार इस विधेयक के समस्त प्रावधान पूर्णतः भ्रान्त धारणा पर आधारित हैं। पैथीनसी स्मृति में कहा गया है कि -
| iap | e |
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| kr | `r |
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पंचमीं मातृतः परिहरेत् सप्तमीं पितृतः
अब तक यह स्पष्ट है- कि मातृकुल से पांच पीढि़यां और पितृकुल से सात पीढियाँ। पैथीनसी स्मृति में भी अब तक यही कहा गया है। आगे इसमें कहा गया है किः त्रीन् मातृतः पंचपितृतो वा।
इसमें दूसरा विचार दिया गया है और कहा गया है कि मातृकुल से तीन और पितृकुल से पाँच। यदि मेरे पास समय होता तो मैं अन्य सभी स्मृतियों को उद्धृत करके अपने कुछ मित्रों के इस वक्तव्य का खण्डन कर देता कि स्मृतियों में अलग-अलग