हिंदू कोड-जारी - Page 390

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नियम निर्धारित हैं- किसी में सात और पांच तो किसी में पांच और तीन; और इनमें से चयन हमें करना है।

मीमांसा में इन पुस्तकों की व्याख्या करने की विधि निर्धारित की गई है। हिन्दू कानून का आधार ही इस तथ्य पर टिका है कि नियम श्रुति से आता है। श्रुतियां स्वतंः प्रमाण हैं। श्रुतियों में जो कुछ लिखा है वह स्वयंसिद्ध है और आगे और कोई तर्क-वितर्क आवश्यक नहीं है। स्मृतियां परतः प्रमाण हैं। उनके पास वह प्राधिकार नहीं है क्योंकि वे श्रुतिमूल हैं। वह उस श्रेणी में आती हैं, जिसका प्राधिकार श्रुतियों से व्युत्पन्न है। अब यह स्पष्ट है कि यदि सभी स्मृतियों में एक ही स्रोत प्रयुक्त किया गया है तो आपत्ति भी यही होगी- और मेरे विचार से यह स्वाभाविक आपत्ति भी है- कि यदि आपका दावा है कि उन सभी के उद्गम का स्रोत एक ही है तो उनमें परस्पर विरोधी बातें कैसे हो सकती हैं। हम इस आपत्ति का अनुमान कर सकते हैं।

मीमांसा में आगे कहा गया है कि कुछ मामलों में ऐसा भी हो सकता है कि स्वयं श्रुति ही अविकल्प हो अर्थात् श्रुति में दो विकल्प निर्धारित किए गए हों, कि कोई बात यह हो सकती है या अन्य।

श्रुतियों में भी इस स्वरूप के अनेक दृष्टांत हैं -

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10.00 बजे पूर्वाह्न

यह स्मृतियों से लिया गया है। इसमें कहा गया है कि कोई यज्ञ सूर्योदय से पूर्व किया जा सकता है और यह भी कहा गया है कि इसे सूर्योदय के पश्चात भी किया जा सकता है। परन्तु विरोध नहीं है क्योंकि श्रुति में दोनों का उल्लेख है। और मीमांसा शास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार अन्य बातें भी लागू होती हैं। तकनीकी दृष्टि से इसे आत्मतुष्टि कहा जाता है और आत्मतुष्टि के सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को इसका निर्णय करना होता है- भोग-विलास के लिए नहीं। आत्मतुष्टि से भोग -विलास से अभिप्रेत नहीं है, इसका तात्पर्य अपनी मौज के लिए आज यह लेना और कल वह लेना, आज चावल लेना और कल चपाती लेना नहीं है। परन्तु आत्मतुष्टि का एक मौलिक धार्मिक स्थान है। आत्मतुष्टि के अनुसार धर्म का चयन करना होता है और एक बार चयन कर लिए जाने पर यह स्थायी रूप से रहता है, हमेशा के लिए। लेकिन तभी होता है जब दोनों बातें श्रुति में कही गई हों। इस प्रकार दोनों बातें जब श्रुति में उल्लिखित हों, तब विकल्प आता है।