24 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इस संहिता के अनुसार विवाह दो प्रकार से हो सकते हैं, सांस्कारिक विधि और सिविल। सांस्कारिक विधि का अर्थ है, विवाह जो धर्म के अनुसार हो। यह कोई भी धर्म हो सकता है। यह किसी के रास्ते में भी बाधक नहीं है। उदाहरण के तौर पर सनातन वैदिक धर्म के कुछ आवश्यक अनुष्ठान हैं। मेरा कहना है कि किसी भी धर्म के लोगों को इसके लिए डरने की आवश्यकता नहीं कि उनका पूरा धर्म नकारात्मक हो जाएगा।
श्री त्यागी -जो पहले ही किसी दूसरे संहिता के अनुसार विवाहित हो चुके हैं, उनका क्या होगा?
श्री सरवटे : मेरे माननीय मित्र श्री त्यागी उचित समय आने पर आवश्यक संशोधन सुझा सकते हैं।
इसलिए मेरे सुझाए गए संशोधन के अनुसार संविधान के सभी परन्तुक खरे उतरते हैं; वे माननीय डॉ. अम्बेडकर द्वारा विधेयक को प्रस्तुत करते समय जो कहा गया था उसके अनुसार ही हैं। ये इन सभी दावे जो इस विधेयक में किए गए हैं, जो तर्क, न्याय और संगत के अनुसार ही हैं। मैं इसलिए सदन से अपने संशोधन की सिफारिश करता हूँ और विधेयक को मान्यता देने के लिए प्रस्तुत करता हूँ।
माननीय अध्यक्ष : माननीय सदस्य श्री गोपीनाथसिंह के नाम कुछ संशोधन हैं। वे आज ही आए हैं। इस सदन के नियम के अनुसार जब तक कि विधेयक के लिए माननीय सदस्य न कहे अध्यक्ष उनकी अनुमति नहीं दे सकता। नोटिस आज ही आई है, मैं आदरणीय डॉ. अम्बेडकर से पूछना चाहूँगा कि क्या वे स्वीकृति देते है?।
डॉ. अम्बेडकर : मुझे उन संशोधनों की प्रतियाँ नहीं मिलीं अतः मैं कुछ नहीं कह सकता।
श्री इन्द्र विद्यावाचस्पति : महोदय, मेरे संशोधन के अनुसार हिंदू संहिता अधिनियम पारित होने पर यह प्रत्येक भारतीय पर लागू होना चाहिए। इसमें जाति, वर्ग या धर्म के आधार पर कोई अन्तर नहीं होना चाहिए। यही मेरा संशोधन है। प्रारम्भ में मैं संसद का एक वर्ष से सदस्य हूँ मैं यह कहना चाहूँगा जबकि मैं आज ही क्यों बोल रहा हूँ। मैंने सदन का एक मिनट भी नहीं लिया। यह इसलिए क्योंकि अध्यक्ष महोदय का कहना है कि संसद के हर मिनट का मूल्य पचास रुपए है। इसलिए मैंने संसद के हजारों रुपये बचाए हैं, लेकिन मैं आज कोई भी बचत करने के लिए उद्यत नहीं हूँ। कारण, मेरे मन में शुरू से भय बना हुआ है और मैं यह अनुभव कर रहा हूँ कि इस विधेयक के पारित होने या न होने दोनों में ही कठिनाइयाँ हो सकती हैं। मैं एक पक्का समाज सुधारक हूँ और मैं चाहता हूँ कि समाज सुधार के लिए ऐसा विधेयक होना चाहिए। राज्य को समाज में सुधार लाने के लिए कानून बनाने का अधिकार