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है। इसीलिए मैं यह बताना चाहता हूँ कि यह नहीं कहा जा सकता कि यह किसी धर्म में रुकावट पैदा करेगा। दूसरी ओर मेरी राय है कि राज्य और संसद को समाज सुधार से सम्बन्धित ऐसा अधिनियम बनाने के लिए कदम उठाने चाहिए।
मैं यह नहीं कहना चाहता कि यह विधेयक पारित नहीं होना चाहिए बल्कि डरता हूॅँ, यह विधेयक उसी रूप में पारित नहीं होगा जिस रूप में इसे प्रस्तुत किया गया है। यद्यपि डॉ. अम्बेडकर और हमारे प्रधानमंत्री ने बराबर यही विचार व्यक्त किया है कि यह पारित हो। मेरे विचार से तब तक बजट सत्र जैसे लम्बे सत्र में भी हम इसे पारित कर पाएंगे। जब तक कि चर्चा न रोकी जाए। लेकिन ऐसे विधेयक पर जिसका असर पूरे देश पर होगा, चर्चा रोकना ठीक नहीं होगा। इसलिए पहली कठिनाई यही है। इस विधेयक को वर्तमान रूप में पास करने में दूसरी कठिनाई है कि वर्तमान रूप में इस विधेयक को पास करके हम बुराईयों को बढ़ावा देगें, जो नहीं होना चाहिए और जिसके हम हमेशा विरोधी रहे हैं। और वह बुराई है साम्प्रदायिकता। अगर हम हिंदू संहिता विधेयक पारित करते हैं तो साम्प्रदायिकता नामक बुराई हमेशा के लिए सिर उठाएगी। क्योंकि यह विधेयक जन-समूह के सभी वर्गों पर लागू नहीं होगा। यह पक्के तौर पर साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देगा। अगर विधेयक पारित नहीं हुआ तो मुझे डर है, विधान के द्वारा समाज सुधार हमेशा के लिए बन्द हो जाएगा। मुझे इसके पास होने की बहुत कम आशा है, लेकिन अगर यह पारित हो गया तो साम्प्रदायिकता की भावना बढ़ेगी और जो वरदान होना चाहिए एक श्राप में बदल जायेगा। इसलिए जब भी मैं समाज सुधार के रास्ते में रुकावटें और कठिनाइयाँ देखता हूॅँ, मैं कुछ कहने के लिए सोचता हूँ। मैं स्पष्टरूप से कहना चाहूँगा कि मैं समाज सुधार के लिए कानून बनाने के पक्ष में हूँ। मैं प्रस्तुत सुधारों के विस्तार में नहीं जाना चाहता, लेकिन मैं विषयों के कुछ शब्द, जैसे बहुविवाह के बारे में कहना चाहूँगा। मैं चाहता हॅँ हमारे देश में केवल एक कानून लागू हो जाना चाहिए, केवल हिंदुओं पर ही नहीं बल्कि जन-समूह के सभी वर्गों पर। इसी प्रकार मेरा कहना है कि महिलाओं को न्याय मिलना चाहिए उनके आर्थिक अधिकार सुरक्षित रहने चाहिए। मैं यह विश्वास नहीं करता कि केवल हिंदू महिला ही उत्पीडि़त है। दूसरे समुदाओं में भी महिलाएँ हैं, जो उत्पीडि़त हैं। यह जुल्म समाप्त होने चाहिए। अच्छा यही होगा, कि अगर समाज स्वयं ही इस जुल्मों को हटा दे नहीं तो कानून को लाना होगा। अगर एक संविधान पूरे देश के लिए समानता और न्यायोचित सिद्धान्तों पर बनाया जा सकता है, तो कानून पूरे समाज के लिए क्यों नहीं बनाया जा सकता। मेरे विचार से इसी प्रकार विवाह विच्छेद का प्रश्न है। हम इसके विरुद्ध शास्त्रों से उद्धरण सुनते हैं। मैं उस विषय की चर्चा नहीं करना चाहता लेकिन मैं धर्मशास्त्रों के आधार पर यह कह सकता हूँ कि ऐसा शास्त्रों में नहीं कहा गया यह कहना गलत