376 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उदाहरण के लिए :
अतिरात्रे षोड़शिनं गृह्णाति। नातिरात्रे षोड़शिनं गृह्णति।
| Col1 | Col2 | Col3 |
|---|---|---|
| kksM+ | ' |
| Col1 | Col2 |
|---|---|
| `g~ | kkf |
| Col1 | Col2 |
|---|---|
| kf | jk |
| Col1 | Col2 | Col3 |
|---|---|---|
| ksM+ | ' |
| Col1 | Col2 |
|---|---|
| `g~ | kf |
(देर रात्रि में सोलह में से एक ग्रहण करता है, गहन रात्रि में कुछ भी नहीं)
श्रुति में दो परस्पर विरोधी बाते हैं दोनों के होने पर ही विकल्प संभव है। यदि स्मृतियों में दो भिन्न बातें कही गई हों, तब यदि हम देखते हैं कि श्रुतियों में भी दो बातों का उल्लेख है, तभी विकल्प संभव होगा और मेरे मित्र माननीय विधि मंत्री और अन्य मित्रों का दावा सही होगा कि ये प्रावधान श्रुतियों में जो कहा गया है, उस पर आधारित हैं। परन्तु उपलब्ध श्रुतियां इस मुद्दे पर मौन हैं। इस मामले पर कोई निर्देश नहीं दिया गया है। तब प्रश्न उठता है कि यदि उन्होंने इसे श्रुतियों से लिया है तो स्मृतियों में भिन्न नियम क्यों हैं?
उपाध्यक्ष महोदय : मेरा विचार है कि विधेयक यथासंभव श्रुतियों के अनुसार और यदि आवश्यक हो तो स्मृतियों के बिना होना चाहिए। मेरे ख्याल से विधि मंत्री का यही विचार है। अतः यह संदेह होते हुए भी कि व्याख्या के कड़े नियमों के अनुसार ये तीन है या पांच - उन्हें उसके अनुरूप बनाना होगा; मुझे नहीं लगता कि वे इस प्रस्ताव का खण्डन करते हैं कि किसी भी विसंगति से बचने के लिए उन्होंने इसे उसके अनुरूप ही रखा है। यदि व्याख्या के नियमों से भी यह सिद्ध नहीं होता और यदि वे कहते हैं कि यह सही है और सदन के अनुमोदन से इसे अपनाया जाना चाहिए। मुझे लगता है कि विधि मंत्री जी का भी यही विचार है। डॉ. अम्बेडकर : जी हां।
उपाध्यक्ष महोदय : अतः इस बात पर और बहस करने की आवश्यकता नहीं है कि व्याख्या क्या है।
पंडित मालवीय : जैसा कि मैंने कहा मैं यह सब इस बात की व्याख्या के लिए नहीं कह रहा हूँ। मैं इस मामले का दृष्टिकोण दिखाने के लिए इसे एक उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत कर रहा हूँ। मैं कहना यही चाहता हूँ कि मीमांसा शास्त्र के अनुसार दो ग्रन्थों, जिनमें एक पाँच और सात पीढि़याँ कहता है तो दूसरा तीन और पाँच पीढि़याँ कहता है, उनका समाधान किया जाना चाहिए और इसकी व्याख्या अचूक और असंदिग्ध व्याख्या अवश्य होनी चाहिए। ऐसी व्याख्या ढूंढनी चाहिए जो असंदिग्ध और निर्विवाद हो। अन्यथा स्मृति, स्मृति नहीं रहती है। पैथीनिसी स्मृतियों में शामिल है। यदि हम इसे ढूंढें तो हम देखेंगे कि स्मृति संग्रह में है। निबंधकार में है। इस भिन्नता की स्पष्ट व्याख्या की है, न केवल विधान है बल्कि सिद्ध किया गया है -