378 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जिस पर हिन्दू कोड टिका हुआ है। यही वह एक वाक्य है जिस पर प्रत्येक की अपनी वैचारिक स्थिति प्रतीत होती है। यह एक अत्यंत सरल मामला है। व्याकरण के नियमानुसार पति की सप्तमी में एकवचन पत्यो है। यह एक निश्चित सूत्र के अनुसार बनता है। मैं नहीं जानता कि पत्यो और पतौ शब्द किस प्रकार बनते हैं। यह विस्तार से बताने की अनुमति आप मुझे देंगे। मैं जानता हूँ कि यह जानना बड़ा दिलचस्प होगा, लेकिन इसमें समय लगेगा। लेकिन हर बात स्पष्ट हो जाएगी यदि हम इसे समझ लें।
उपाध्यक्ष महोदय : ’हरि’ का क्या होगा? यह तो पुल्लिंग है।
पंडित मालवीय : महोदय, आपकी भी इसमें दिलचस्पी है और यदि आप मुझे
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अनुमति दें........
उपाध्यक्ष महोदय : हरि इकारांत पुल्लिंग है और इसकी सप्तमी हरौ है और पति की पतो होनी चाहिए। यही मेरी कठिनाई है। मैं नहीं जानता कि क्या यह अलग है।
पंडित मालवीय : महोदय, आपका सवाल बिल्कुल वाजिब है। यही होता है। हरि
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से हरौ बनता है। इसलिए, इसी प्रकार पति से पतौ बनना चाहिए। परन्तु हम सब जानते हैं कि यह पत्यौ है। क्यों? अन्तर इस प्रकार है। जब सप्तमी एकवचन होती है, घि आता है। तब सूत्र पति एवं समास लागू होता है और घि संज्ञा का लोप हो जाता है और दूसरा सूत्र औत प्रयुक्त होता है और यह पति जमा औ होता है। तब सूत्र इकोयानाची ’ई’ ’या’ में परिवर्तित हो जाता है और पत्यौ शब्द बनाता है। यह पति शब्द के सामान्य अर्थ के मामले में होता है। नियम स्पष्ट रूप से निर्धारित है - पतिः समास एव। महोदय अब प्रश्न यह उठता है कि पत्यौ के ’बजाए पतौ क्यों प्रयुक्त’ किया गया है। यह इतनी जाहिर सी बात है कि अंधा आदमी भी देख सकता है कि जब कुछ अन्तर है तो उसका कुछ प्रयोजन भी है। माननीय विधि मंत्री जी कृपया मुझे क्षमा करेंगे कि पति की सप्तमी का सामान्य रूप पत्यौ है। परन्तु इस ग्रन्थ में पतौ प्रयुक्त किया गया है (व्यवधान) एक माननीय सदस्य कहते हैं कि उन्हें अत्यधिक संदेह है। उनके जितनी बुद्धि मुझमें होने का दावा मैं नहीं करता हूँ। परन्तु पाणिनी की अष्टाध्यायी है और यदि कोई माननीय सदस्य इसके विपरीत कुछ सिद्ध करते हैं तो वे जो कहेंगे वही मैं करूँगा।
श्री अमोलख चन्द : क्या माननीय सदस्य वह श्लोक भी उद्धृत करेंगे?
पंडित मालवीय : मैं उसी पर आ रहा हूँ। इसलिए जो शब्द प्रयुक्त किया गया
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