हिंदू कोड-जारी - Page 395

380 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पंडित मालवीय : अन्यो पुनः प्रथमा है।

उपाध्यक्ष महोदय : प्रथमान्यः भी पति होना चाहिए।

पंडित मालवीय : यदि दोनों एक समान होते, तो पहले स्थान पर पत्यौ होता।

उपाध्यक्ष महोदय : प्रावधानों से चाहे जो आशय हो उन्हें एक-दूसरे के अनुरूप होना चाहिए।

पंडित मालवीय : महोदय, यह कैसे हो सकता है जब उसका प्रयोजन ही भिन्न है। संस्कृत भाषा की यह विशिष्टता है कि दूसरी भाषा में जो कुछ एक वाक्य में कहा जाता है उसे यह शब्द में अभिव्यक्त कर देती है। यही संस्कृत भाषा का सौन्दर्य है। यदि किसी वाक्य में कहा गया है कि “आम उपलब्ध नहीं, अमरूद खाए जा सकते है” तो हम यह नहीं कह सकते हैं कि आम और अमरूद एक ही है।

उपाध्यक्ष महोदय : एक दूसरे से पूर्णतः असंबद्ध है। दो मामलों के बीच कोई तुलना नहीं की जा सकती है। यदि ’अन्यो’ प्रयुक्त हुआ है तो वह शब्द अथवा अन्य शब्द समान श्रेणी के होने चाहिए। यदि एक मामले में यह विवाह नहीं है तो दूसरे मामले में भी यह विवाह नहीं है। यदि एक मामले में यह विवाह है, तो दूसरे मामले में भी यह विवाह है। दोनों मामलों में यह पति का ही विवाह है।

पंडित मालवीय : हम शब्दों के अर्थ बदल नहीं सकते हैं ........

श्री बी. के. पी. सिन्हा (बिहार) : महोदय, मैं देख रहा हूँ कि यह बहस शैक्षणिक

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है। श्लोक में पति और पत्यौ शब्द हैं, न कि पतौ।

पंडित मालवीय : वह छापे की गलती होगी। मैं यह बात मजाक में नहीं कह रहा हूँ। मूल ग्रन्थ में पतौ है। बहुत चौड़ा ........

उपाध्यक्ष महोदय : पतिते पत्यौ गलत है क्योंकि यह ’गुरू’ होना चाहिए। पिंगलशास्त्र के अनुसार पति और पत्यौ अलग-अलग होने चाहिए। जाहिर है कि यह गलत है।

पंडित मालवीय : यह स्पष्ट है कि यह पत्यौ नहीं हो सकता है। मेरा निवेदन यह था कि जिस आधार पर यह इमारत खड़ी की गई है उस आधार का अस्तित्व ही नहीं है और प्रयुक्त शब्द का अर्थ पति नहीं है; यह पत्यौ नहीं है बल्कि वह व्यक्ति है जो पति बनने वाला है, अर्थात् पतौ। इस प्रकार शास्त्रों में ऐसा कुछ नहीं है जिससे ज्ञात होता है कि एक विवाहित हिन्दू स्त्री पुनः विवाह कर सकती है।