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मैं सदन का अधिक समय नहीं लेना चाहता हूँ। मैं कई बातें कहना चाहता था। परन्तु मैंने जो उल्लेख किया, उसे ध्यान में रखते हुए मैं उन लोगों की इच्छा के विरुद्ध नहीं जाना चाहता, जिनकी आकांक्षाएं और शब्द ही हमारे लिए कानून हैं। इसलिए मैं और अधिक समय नहीं लेना चाहता, हालांकि मैं और कई बातें कहना चाहता था। इन दोनों उदाहरणों के माध्यम से मैंने यह दिखाने का प्रयास किया है कि जिस पर हिन्दू कोड आगे बढ़ रहा है वह आधार ही पूर्णतः भ्रामक है।
एक और बात का उल्लेख करते हुए मैं अपने शब्दों को विराम दूँगा। हिन्दू समाज में अनादि काल से राज्य के प्राधिकार के बिना, पुलिस के प्राधिकार के बिना किसी भी विधानमंडल के प्राधिकार के बिना कानून चला आ रहा है। जो कानून चले आ रहे हैं उनके पीछे कोई सरकारी संस्वीकृति नहीं रही है। ये कानून उन व्यक्तियों ने बनाए थे जिन्होंने, कोई व्यक्ति जितनी पूर्णता प्राप्त कर सकता है वह प्राप्त कर ली थी, जो सार्वभौमिक आदर के पात्र थे, जिन्होंने लोगों की भलाई के लिए कार्य किया था और इस पर शास्त्रों में जिसे अपूर्व कहा गया है उसकी स्वीकृति थी, कि जो कतिपय परिस्थितियों के अंतर्गत घटित होगा, यह विचार कि कोई आज जो कुछ कर रहा है उसका प्रभाव भविष्य में होगा; कि मनुष्य की आत्मा का, जीव का केवल एक जीवन नहीं होता, अपितु वह अनेक जन्म लेता है, कि एक जीवन के कर्म पिछले और भावी जीवन के कर्मों और परिणाम से आपस में जुडे़ होते हैं; कि सद्गुणों और धर्मपरायण् ाता और न्यायप्रियता का पुरस्कार व्यक्ति के इस जीवन की सुख-सुविधाओं से वास्तव में वृहत्तर होता है। वस्तु की क्षणभंगुरता ही नहीं बल्कि उसके वास्तविक मूल्य की स्पष्ट अवधारणा का भी सदैव-सदैव ध्यान रखा जाता था, और बनाए गए कानूनों का अनुपालन सदैव इसी स्वीकृति और इसी आस्था के आधार पर किया जाता रहा है। इस पूरे देश में, इसके कोने-कोने में हिन्दुओं के कानून का अनुपालन किया जाता रहा है, इसलिए नहीं कि किसी ने - उदाहरण के लिए मेरे सम्माननीय मित्र काका साहब गाडगिल, जो सदन में आते हैं और जिन्होंने एक वयोवृद्ध जिम्मेदार व्यक्ति की तरह नहीं, जैसा कि हम सब उन्हें जानते हैं बल्कि एक जिन्दादिल नौजवान की तरह, जो उस क्षण जो मन में आए बोलता चला जाता है, उसकी तरह ही हिन्दू कोड पर अपनी बात रखी - या और किसी ने उसे अपने लिए अनुकूल पाया या नहीं पाया, उसे जीवंत या उबाऊ पाया, बल्कि इसलिए कि काका साहब और गोविन्द मालवीय दोनों और उनके जैसे तीस करोड़ दूसरे लोग, जिनमें एक अटूट आस्था और विश्वास है कि वे जो कुछ आज कर रहे हैं उसके परिणाम कल होंगे और जो कुछ अभी भुगत रहे हैं इसका पुरस्कार उन्हें मिलेगा। वे इस विश्वास के साथ बड़े हुए हैं कि जीवन में केवल प्रेय ही सब कुछ नहीं है, बल्कि सभी बातों के श्रेय पर भी मनोयोगपूर्वक