382 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
विचार किया जाना चाहिए। इस देश और इस समाज की यही विचारधारा रहती आई
है। सरकार को हम बिना विचार किए और जल्दबाजी करते हुए तानाबाना ही ध्वस्त
करने की गलती न करने दें जिस पर कानून के प्रति आदर और उसके अनुपालन का
भाव टिका हुआ है। यदि विधि-निर्माताओं का एक समूह, विद्वज्जनों या ज्ञान-दंभियों
का एक समूह, एक विशेष तरीके का कानून बनाता है जिसे वह उचित समझता है
तो लेग ’अपूर्व’ की चिन्ता करना ही छोड़ देंगे। लोग यह जान जाएंगे कि अगले
ही दिन एक ऐसा कानून बना लेना भी उनके लिए संभव है जो उन्हें पसन्द और
सुविधाजनक हो। ऐसे तो नैतिक तानाबाना ही मिट जाएगा और मनुष्य आदिम युग
में लौट जाएगा जब विवाह की कोई विधि या पद्धति ही नहीं थी, जहां ऐसी स्थिति
आ जाएगी, जो सभ्य समाज में संभवतः उल्लेख योग्य भी नहीं होगी। यही प्रतिष्ठा
है जो दांव पर लगी हुई है।
मैं विवाह-विच्छेद के प्रश्न पर बोलना चाहता था; मैं विधवा पुनर्विवाह के प्रश्न
पर बोलना चाहता था; मैं अन्तर्जातीय विवाह के प्रश्न पर बोलना चाहता था; मैं
एक विवाह के प्रश्न पर बोलना चाहता था। मुझे आशा है कि जब उचित समय पर
इस प्रत्येक विषय से संबंधित खण्डों पर विचार किया जाएगा, तब मुझे भी अवसर
मिलेगा। हमें इन समस्याओं पर समाज के समग्र हित और भलाई के दृष्टिकोण से
विचार करना चाहिए। मैंने कहा समाज। समाज से अभिप्राय लोगों के समस्त समूह
सभी निवासियों से है। यह इकाईयों से, व्यक्तियों से मिलकर बनता है। परन्तु इकाई
और समग्र, चाहे वह अभिन्न परस्पर आश्रित हों, उनका पृथक अस्तित्व भी होता है।
शरीर सभी अंगों से मिलकर बनता है। परन्तु हाथ का अपना अस्तित्व होता है; सिर
का अपना। हाथ, पैर सिर के बिना शरीर नहीं हो सकता।
परन्तु शरीर हाथ या पैर या सिर नहीं है। यह प्रश्न इन सबका कुल योग है।
इसीलिए, जब हम समाज का विचार करते हैं तब हमें सम्पूर्ण समाज की भलाई और
हित का विचार करना होता है और जब किसी बात में सबका हित और भलाई है,
तब चाहे वह प्रिय हो या चाहे वह एक व्यक्ति को या किसी दूसरे व्यक्ति को कम
प्रिय हो, उसे अवश्य अपनाया जाना चाहिए। जब ये विषय आएंगे तब, मुझे आशा है
कि मुझे उन पर विचार रखने का अवसर मिलेगा। इसमें शामिल मुद्दों का स्पष्ट रूप
से विवेचन करने, अपनाए गए दृष्टिकोण के दोष अथवा सत्यता और इसके परिणाम
के बारे में मैं काफी कुछ कहना चाहता था। और अब महोदया, मुझे एक और लाभ
होना था, कि सदन की एक सम्माननीय सदस्या अध्यक्ष की आसंदी पर विराजमान
हैं और मेरे साथ उतनी ही निष्पक्ष होंगी जितनी वे किसी अन्य सदस्य के साथ होती