384 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
नहीं है कि कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनका विचार है कि यदि ऐसा कानून बनाया जाता है तो यह समाज के हित में होगा। मैं उनसे अपील करता हूँ कि इस बारे में वे सही तरीके से आगे बढं़े। कुछ समय पहले अन्तर्जातीय विवाह अधिनियम पारित किया गया था जिसमें आर्य समाजियों में अन्तर्जातीय विवाह वैध बनाया गया था। उसी समय एक विद्वान और मनु के भक्त डॉ भगवान दास जी ने तत्कालीन केन्द्रीय एसेम्बली के समक्ष उस खण्ड को सभी हिन्दुओं पर लागू करने के लिए एक बिल पेश किया था। बिल पर कार्यवाही नहीं की गई और उस पर विस्तृत और व्यापक विचार-विमर्श के बाद उसे पारित नहीं किया गया। पिछले कुछ दशकों से आर्य समाजियों के बीच अन्तर्जातीय विवाह होते रहे हैं और जब यह आम बात हो गई तब उन्होंने लम्बे समय तक आन्दोलन भी चलाया और समय आने पर उपाय अपना लिया गया। आइए इसका अनुकरण हम भी करें। यदि समाज सुधार किया जाना है तो इस पर कोई आपत्ति नहीं कर सकता है यदि उससे जुड़े सभी लोगों की भी यही आकांक्षा हो। इसलिए हम भी वही रास्ता अपनाएं ताकि जो कुछ आपने किया है वह बेअसर रहते हुए केवल कागजों तक सीमित न रह जाए।
यह भी उल्लेख किया गया है कि चूँकि हम इस कोड में अभी केवल विवाह और विवाह-विच्छेद से जुड़े भाग पर ही बहस कर रहे हैं, तो इस प्रयोजनार्थ हमें एक अखिल भारतीय अखिल सामुदायिक कोड तैयार करने की व्यवहार्यता पर भी विचार करना चाहिए। मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जिनका यह कहना है कि यदि एक पत्नी विवाह अच्छा है और हिन्दुओं के लिए अनिवार्य किया जाना है तो इसे सभी पर लागू किया जाए। मेरा यह कहना नहीं है यदि कल विवाह अच्छा है तो मैं इसे हिन्दुओं के लिए चाहता हूँ चाहे किसी और पर लागू किया जाता है अथवा नहीं किया जाता। यह निर्णय दूसरों को करना है और यदि वे इसे नहीं चाहते हैं तो न सही लेकिन यदि हिन्दुओं के लिए यह हित में है तो यह उन पर लागू होना चाहिए (एक माननीय सदस्यः क्या यह हित में है?) यह अच्छा है और मेरा विचार है कि इसमें यही एक अच्छी बात है; परन्तु इसका यह मतलब नहीं कि हम अच्छी बात की आवश्यकता से आंखें मूँद लें या हम अन्य संबंधित तथ्यों और पहलुओं पर विचार न करें। जहां तक कल विवाह के सिद्धांत का संबंध है मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं है, इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए और मुझे दुःख होगा यदि कहीं पर भी कल विवाह पद्धति के सिवाय व्यवहार में और कुछ पाया जाता है ........
ज्ञानी जी. एस. मुसाफिर (पंजाब) : जो बात अच्छी है उसे अपना लेने में कोई
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नुकसान नहीं है।