26 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है। उनमें हर विषय के पक्ष एवं विपक्ष में दिया गया है। यहाँ 137 स्मृतियाँ हैं। एक ही सिद्धान्त है वह है मनुस्मृति, उसमें लिखा है :-
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| Col1 | ksèkr |
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हृदयेनाम्यानुग्यातोओ धर्मास्नानेबोधत सन्निबोध।।
(इसका अर्थ है कि धर्म वह है जो हमेशा अच्छे के लिए प्रयोग हो, पूर्ण हो और जो पक्षपात को हटाए और लगाव और पूरी तरह दिल को छूने वाला हो।)
मनु ने स्वयं कहा है कि उसके सामने स्मृतियाँ हैं। इसलिए इन स्मृतियों को बहुत लम्बे समय तक माना जाता रहा। यह कहना गलत है कि हमारे समाज में कोई सुधार नहीं होना चाहिए। इससे तो हमारे देश की प्रगति पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। समाज में सभी आवश्यक सुधार किए जाने चाहिए। मैं विस्तार में नहीं जाना चाहूँगा क्योंकि बाद में विधेयक पर खंडवार चर्चा होगी और उसी समय संशोधन किए जा सकते हैं। इसलिए मैं इसे टालने के पक्ष में नहीं हूँं। लेकिन एक बात निश्चित है कि अगर यह इसी रूप में पारित हुआ तो बहुत-सी कठिनाइयाँ आएंगी। मेरी राय में सरकार को एक भारतीय संहिता बनानी चाहिए जो पूरे देश में लागू हो। सुधार पूरे भारत में ही होने चाहिए।
अब मैं इसे केवल हिंदुओं पर ही लागू करने की हानियाँ बताना चाहूँगा। प्रथम स्वतंत्र भारत के संविधान के अनुसार हम साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देना नहीं चाहेंगे। हमारा धर्म निरपेक्ष राज्य है। ऐसी परिस्थितियों में सरकार एक समुदाय विशेष के लिए कानून नहीं बना सकती। इस विषय पर वकील अधिक चर्चा कर सकते हैं, लेकिन एक आम आदमी की तरह मेरा प्रस्ताव है कि जहाँ धर्म को कोई स्थान न दिया गया हो या विचार न किया गया हो, यह न्याय के विरुद्ध है कि किसी एक धर्म विशेष के मानने वालों के लिए कानून बनाया जाए। ऐसे उठाए गए कदम से हमेशा साम्प्रदायिकता को बढ़ावा मिलेगा।
इस विधेयक की उत्पत्ति ब्रिटिश राज्य में हुई थी। उस समय हिंदुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे से अलग रखा जाता था और हर बात साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने के लिए की जाती थी। इस तरह विधेयक का प्रारम्भ उन हालात में हुआ था। मैं यह कहना चाहता हूँ कि ब्रिटिश समय के अवशेषों पर क्यों चिपके रहें जबकि हमने और दूसरी बातों को उठाकर फेंक दिया है जिससे कि समाज के किसी विशेष समूह के विरुद्ध भेदभाव न हो सके।
श्रीमती दुर्गाबाई : व्यवस्था के प्रश्न पर, महोदय, मैं समझती हूँ माननीय सदस्य,
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संसद की सक्षमता पर प्रश्न उठा रहे हैं........।