हिंदू कोड-जारी - Page 405

390 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

भीषण दुर्भावना के बावजूद इसे पेश करने के लिए बधाई देना चाहती हूँ। इस देश के कुछ तबकों पर प्रतिक्रियावादी ताकतों का वर्चस्व अभी भी कायम है। इस विधेयक के रचयिता की सराहना के लिए केवल मेरे शब्दों की दरकार नहीं है। क्योंकि इस कानून को चाहे यह स्वीकार करें या अस्वीकार कर दें; डॉ. अम्बेडकर समाज के प्रति समर्पित उन सांसदों में शुमार हो जाएंगे, जिन्होंने सामाजिक अन्याय का उन्मूलन करने और मानवीय गरिमा में वृद्धि करने के लिए विरोध सहते हुए और उत्पीड़न का सामना करते हुए लम्बे समय तक संघर्ष और परिश्रम किया है।

अनेक वर्षों तक इस विशाल देश के कोने-कोने में रहने वाले स्त्री-पुरूषों ने इस विधेयक के पारित होने की प्रतीक्षा की है। उन्होंने इसके मूल प्रबल रूप को घटते हुए भी देखा, क्योंकि इसके लिए अधिक से अधिक समर्थन जुटाने के लिए समझौते के बाद समझौता करना व्यावहारिक समझा गया। लेकिन यह विधेयक अपने वर्तमान और छिन्न-भिन्न रूप में एकमात्र व्यापक उपाय है, जो हिन्दू महिलाओं को असमान कानूनों, जो उन पर आज भी लागू हैं, से मुक्ति दिलाने के लिए तैयार किया गया है। उन गरीब दिग्भ्रमित महिलाओं के विरोध को भी मैंने नजरअंदाज नहीं किया है और न ही मैं उन्हें आवश्यकता से अधिक महत्व देने की गलती कर रही हूँ, जिनकी अज्ञानता और अंधविश्वास का धर्मांध निहित स्वार्थी तत्वों ने अपनी ठेकेदारी को कायम रखने के लिए कपटपूर्ण फायदा उठाया। यह कितनी बड़ी त्रासदी आज हम देख रहे हैं कि भारत की हिन्दू महिलाएं बहकावे में आकर उसी उपाय का विरोध करने पर उतारू हैं, जो उन्हें कानूनी तौर पर समानता दिलाने के लिए सुविचारित तरीके से तैयार किया गया है, जिसका संविधान के अंतर्गत उन्हें अधिकार है लेकिन आज इस विधेयक का समर्थन मैं न तो एक महिला होने के नाते कर रही हूँ और न ही एक हिन्दू होने के नाते। मैं एक भारतीय होने के नाते बोल रही हूँ, जिसे भारत की गरिमा पर गर्व है और मेरा समर्थन न केवल इस उपाय के लिए है जो अन्याय को दूर करने के लिए और अन्यायपूर्ण कानूनों से उत्पन्न मानवीय पीड़ा को शांत करने के लिए जरूरी है। जब तक इस देश के किसी भी तबके के लोगों को उनके लिंग या जाति या पंथ के आधार पर समान अधिकारों से वंचित किया जाता है, तब तक हमारा संविधान एक खोखला आदर्श बना रहेगा। और उस स्वतंत्रता का क्या, जिसके लिए हमने लम्बे समय तक बहादुरी से लड़ाई लड़ी और जिस लड़ाई में संघर्ष करने के लिए हजारों संवेदनशील हिन्दू महिलाएं जीवन में पहली बार अपने-अपने घरों की सुरक्षित चारदीवारी से निकल कर बाहर आई थीं। वे भी रणभूमि में आकर अपने भाइयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आ खड़ी हुईं, जेल गइंर्, लाठियां खाईं और कई बार वह अपमान सहा, जो उनके लिए मौत से भी बदतर था। अगर आज उन हजारों हिन्दू स्त्रियों को, जो भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ीं,