391
उनके न्यायोचित अधिकारों से वंचित रखा जाता है तो इतनी मेहनत से हासिल की गई हमारी आजादी एक मुट्ठीभर धूल के सिवा और कुछ नहीं है।
इस सदन के अनेक माननीय सदस्यों द्वारा दिए गए भाषणों और वक्तव्यों का मैंने भी सावधानी से अध्ययन किया है और इस विधेयक के तकनीकी कानूनी निहितार्थों का निर्णय करने की उनकी शैक्षणिक योग्यता मुझसे कहीं बेहतर है। एक बात मैं बताना चाहती हूँ कि मुझे यह जानकर थोड़ी हैरानी है कि अपनी सारी कानूनी जानकारी और तर्कशास्त्र की विशेषज्ञता के बावजूद वे इस विधेयक को तहस- नहस करने का कोई हथियार ईजाद नहीं कर सके हैं, जो इस विधेयक के लिए विधि सम्मत भी हो और घातक भी। हम सब लोग हर भाषा में, तरह-तरह के शब्दों और वाक्यों में, घर-घर में, बाजारों में, सड़कों और गलियों में यह सुन-सुनकर अब ऊब चुके हैं कि इस विधेयक से हिन्दू समाज का ताना-बाना नष्ट हो जाने का खतरा पैदा हो गया है। इस सदन के एक अत्यंत प्रतिष्ठित और सम्माननीय सदस्य के एक वक्तव्य को अमेरीका में राष्ट्रव्यापी प्रचार हासिल हुआ, जिसमें उन्होंने घोषित किया था कि यह विधेयक पांच हजार वर्षो से चले आ रहे एक प्राचीन और सहिष्णु धर्म पर किया गया एक आघात है। इसलिए वे इस विधेयक के विरुद्ध ”लड़ते रहेंगे, लड़ते रहेंगे और लड़ते रहेंगे।“ यह बात मेरी समझ से बाहर है कि कोई भी, जिसे हिन्दू कहलाने पर गर्व है, वह ऐसी बात भी कैसे कर सकता है यह सोच भी कैसे सकता है और उसे इसका अहसास भी नहीं है कि वह अपने उसी धर्म का अपमान कर रहा है, जिसकी हिमायत करने का वह दावा भी करता है; गोया कि विश्व के महानतम धर्म को, जो मानव इतिहास में शताब्दियों से स्थान बनाए हुए है, उसे एक सामाजिक कानून बना देने या कोई भाषण दे देने या कुछ लिख देने भर से या किसी के द्वारा कुछ कर देने भर से ही उसके नष्ट हो जाने का खतरा पैदा हो सकता है। यदि दुनिया में ऐसा भी कोई मजहब है जिसे ऐसी छोटी-मोटी बातों से खतरा पैदा हो सकता हो, तो उसका मिट जाना ही बेहतर है। तीन दिन पहले इस सदन में डॉ. श्यामाप्रसाद मुकर्जी ने अपने सम्बोधन में हिन्दू धर्म के पुरातन सौन्दर्य और सिद्धांतों का अत्यंत मार्मिक शब्दों में वर्णन किया था। उन्होंने इसकी तुलनात्मक लोचशीलता का विवेचन किया था-मुझे लगता है उन्होंने अनुकूलता शब्द का इस्तेमाल किया था, जिसने हिन्दू जीवनदर्शन को कई शताब्दियों तक हुए विदेशी आक्रमण और वर्चस्व का सामना करने और भीषण राजनीतिक एवं धार्मिक व आर्थिक आघातों की लहर-दर-लहर का प्रतिरोध करने में समर्थ बनाया। निःसंदेह डॉ. मुखर्जी ने हमेशा-हमेशा के लिए इस निरर्थक और मूर्खतापूर्ण तर्क का करारा जवाब दे दिया है कि वंचित लोगों को न्याय दिलाने के उद्देश्य से बनाया जाने वाला एक सामाजिक कानून जीवमात्र की शुचिता और अविभाज्य एकता की उदात्त अवधारणाओं पर आधारित प्राचीन धर्म के लिए एक खतरा बन सकता है।