हिंदू कोड-जारी - Page 407

392 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इस विधेयक के विरुद्ध एक और गंभीर आरोप लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि विवाह-विच्छेद को एक कानूनी प्रावधान बना दिए जाने से अनैतिकता का द्वार

खुल जाएगा। एक के बाद एक वक्ता ने यहां निर्णायक रूप से यह सिद्ध कर दिया है कि विवाह-विच्छेद का प्रावधान प्राचीन काल में भी था। हम सब जानते हैं कि इस देश के 75 प्रतिशत से अधिक हिन्दू लोगों को विवाह-विच्छेद की एक आसान, सरल और कारगर प्रणाली का लाभ सदैव मिलता रहा है। इसलिए मुझे लगता है कि इस तर्क का कोई वास्तविक आधार नहीं है और मेरे विचार से इसे पश्चिमी देशों और पाश्चात्य तौर-तरीकों की महज आलोचना करने के लिए पेश किया गया है जो हमारे देश में मन बहलाव का एक राष्ट्रीय साधन बनता जा रहा है। मैं बडे़ खेद के साथ इस देश में 325 पीएसडी की बढ़ती प्रवृत्ति का उल्लेख करना चाहूँगी कि कैसे हम दूसरे देशों में अन्य नस्लों की नैतिकता और तहजीब को वहां सब पर लागू कर देते हैं। यह प्रवृत्ति निन्दनीय इसलिए है क्योंक दुनिया के हर देश में पाए जाने वाले चंद बददिमाग और विक्षिप्त लोगों की सनसनीखेज कारगुजारियों को सुनकर अपर्याप्त ज्ञान के आधार पर जल्दबाजी में कोई फैसला ले लिया जाता है। भारत के हर बडे़ शहर में भी ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है। डॉ. मुखर्जी ने बिल्कुल सही तरीके से हमारा ध्यान पश्चिमी देशों के मनोवैज्ञानिकों को उद्वेलित कर रही जिस गंभीर समस्या की ओर दिलाया था वह है तलाक की बढ़ती दर और इसी के अनुरूप बढ़ती मनोविकृति। लेकिन मैं बडे़ सम्मान से डॉ. मुखर्जी से कहना चाहूँगी कि यदि वे इस समस्या पर गहराई से विचार करें और ध्यानपूर्वक विश्लेषण करें तो वे महसूस करेंगे कि पश्चिमी देशों में मनोविकृति तलाक के अधिकांश मामलों का नतीजा नहीं, बल्कि उसका मूल कारण है। अनेक पश्चिमी देशों में विशेष रूप से दोनों विश्वयुद्धों से तहस-नहस हो चुके देशों में जीवन का पूरा संतुलन गंभीर रूप से बिगड़ गया है। अभूतपूर्व आर्थिक संकट, परमाणु बम का विकृतिकारी जुनून और एक और विश्व युद्ध की आहट-इन सबसे पैदा होने वाले तनाव से उत्पन्न होती है शारीरिक और मानसिक असुरक्षा। इनसे उपजती एक किस्म की भावनात्मक असुरक्षा का दुष्प्रभाव पड़ता है पारिवारिक जीवन पर। परन्तु अंत में बात यही आती है कि कुछ देशों में परिस्थितियां चाहे जितनी असामान्य हों, विभिन्न नस्लों की नैतिकता और तहजीब में बाहर से चाहे जितने बदलाव देखे गए हों, लेकिन इंसानी नस्ल हर जगह एक जैसी है और आज भी विश्व के प्रत्येक देश में मानव समाज की आधारभूत इकाई परिवार ही है। संतुलित पुरूष और स्त्रियां आमतौर पर मानवीय संबंधों में शालीनता और गरिमा का मूल्य समझते हैं और तलाक का सहारा हल्के से नहीं लेते हैं। स्थिति असहनीय हो जाने पर अंतिम उपाय के रूप में ही वे तलाक का सहारा लेते हैं। यदि पुरूषों के बारे में यह सच है तो मेरा विचार है कि महिलाओं के मामले