हिंदू कोड-जारी - Page 408

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में यह सौ गुना सच है। क्योंकि युद्धों, क्रांतियों और र्दुर्भक्षों से संत्रस्त इस सतत परिवर्तनशील और अस्थिर विश्व में, जिसमें नैतिक मूल्यों के सभी प्रतिमान ध्वस्त हो रहे हैं, जहां नैतिकता की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संहिताएं प्रकम्पित हैं वहां केवल एक चीज है जो अपरिवर्तित और अडिग है; जो इस सृष्टि के आरम्भ काल में थी और अवसान के समय भी रहेगी। और वह है जीवन की पवित्र ज्योति की सर्जक और रक्षक के रूप में नियति द्वारा एक स्त्री को प्रदत्त उसके गंभीर दायित्व के प्रति जन्मजात चेतना। विश्व में यदि कहीं वह चेतना इतने परिपूर्ण सौन्दर्य से मुखरित हुई, तो वह हमारी इस प्राचीन धरा पर हुई है जिसका इतिहास हमारी स्त्रियों के उच्च आदर्शों से प्रेरित साहित्य एवं विभूतियों से समृद्ध है। इसलिए अपनी स्वतंत्रता का गरिमापूर्ण तरीके से प्रयोग करने की भारतीय स्त्रियों की क्षमता के बारे में इतने हल्के और छिछोरे तरीके से बात करना हमारी अयोग्यता होगी। ऐसा करना अपनी ही प्रजाति की प्रतिभा के प्रति अपनी अनभिज्ञता को स्वीकार करना है।

माननीय सदस्यों ने कुछ रोष भी व्यक्त किया है, जिन्होंने इस सिद्धांत का विरोध किया है कि यह विधेयक महज इसलिए पारित कर दिया जाना चाहिए कि दूसरे देशों की निगाहें भी हमारी ओर हैं। मैं उनसे पूरी तरह सहमत हूँ। लेकिन और देशों की सद्भावना को हम चाहे जितना बहुमूल्य समझें, लेकिन हम अपनी जीवनशैली और कानून को किसी और के प्रतिमानों के अनुसार बना नहीं सकते और न ही बनाएंगे। किन्तु इस विधेयक को पारित करने का एक ठोस और अत्यंत महत्वपूर्ण कारण भी है और वह है हमारी राष्ट्रीय अखण्डता और हमारे लोगों का आत्मसम्मान, जो दांव पर है। इस सदन के माननीय सदस्यों में से अनेक महानुभावों को स्वतंत्र भारत के संविधान का प्रारूप तैयार करने का गौरव प्राप्त हुआ था। इसमें की गई प्रतिज्ञा को मूर्त रूप देने का महती उत्तरदायित्व भी उन्ही पर है, इसलिए इस विधेयक को स्वीकार या अस्वीकार करने का प्रश्न भी उतना ही सरल है कि क्या हम उन मूल सिद्धांतों को स्वीकार या अस्वीकार करते हैं, जिन पर हमारा संविधान आधारित है।

* श्री ब्रजेश्वर प्रसाद (बिहार) : हिन्दू कोड बिल के खण्ड 2 को मैं बिना शर्त

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अपना समर्थन देता हूँ। ऐसा करते हुए मैं उल्लेख करना चाहूँगा कि इस खण्ड को पारित करने का तात्पर्य होगा हिन्दू समाज की एक सबसे बड़ी गलती को कायम रखना और वह है वैध और अवैध बच्चों के बीच अनैतिक भेद। यह खण्ड कहता है कि यह वैध या अवैध किसी भी बच्चे पर लागू होता है। मैं जानता हूँ कि किसी राज्य के लिए उस हद तक जाना संभव नहीं है जिस हद तक मैं भारत सरकार से जाने

* संसदीय वाद-विवाद, खंड XV भाग II, 20 सितंबर, 1951, पृष्ठ 2933-35