394 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की अपेक्षा करता हूँ। मैं चाहता हूँ कि राज्य वैध और अवैध बच्चों के बीच के भेद को समाप्त कर दे। अवैध होने का कलंक बच्चे के व्यक्तित्व को बौना बना देता है। इस देश के लाखों लोगों के लिए स्वयं की कोई गलती न होने पर भी मनोवैज्ञानिक और सामाजिक बाधाओं को जीवन भर झेलते रहना कितना अमानवीय और असभ्य है। कोई यह भी कह सकता है कि वैध और अवैध बच्चों के बीच भेद समाप्त कर दिया जाता है तो विवाह नामक संस्था ही कमजोर हो जाएगी। मेरा निवेदन है कि विवाह संस्था थोड़ी कमजोर हो भी जाती है तो कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ेगा।
पंडित मैत्रा (प. बंगाल) : क्या माननीय सदस्य विवाह को समाप्त करना चाहते हैं?
एक माननीय सदस्य : नहीं, सप्ताहांत विवाह को।
श्री ब्रजेश्वर प्रसाद : विवाह से समाज का जो भला होता है वह अच्छा है लेकिन अवैधता के कारण समाज का जो नुकसान होता है वह भी बहुत ज्यादा और गंभीर होता है। मेरा विचार है कि एक बदनाम सामाजिक व्यवस्था की नींव मजबूत करना राज्य के लिए न तो संभव है और न ही वांछनीय। मैं ऐसे समाज की भी कल्पना कर सकता हूँ, जिसमें विवाह नहीं होता। पत्नियों और बच्चों के प्लेटोनिक समुदाय की अवधारणा आज भी उतनी ही वैध है जितनी कि वह प्लेटो के समय में थी। यदि हम धर्मनिरपेक्षता को अंगीकार करने के प्रति ईमानदार हैं, यदि हमारी धर्मनिरपेक्षता में आस्था है - तो हम अपने आप के प्रति स्पष्ट रहें - हमें सम्पत्ति और विवाह की संस्थाओं को धर्म के बंधनों से मुक्त कराने का प्रयास करना चाहिए। यह सच है कि विश्व के किसी भी भाग में धर्मनिरपेक्षता के आदर्श को प्राप्त नहीं किया गया है।
अमेरीका और यूरोप दोनों में विवाह और सम्पत्ति की संस्थाओं को धर्मनिरपेक्षता नहीं, बल्कि ईसाईयत निर्देशित करती है। मेरी राय है कि विवाह संस्था किसी भी तरह कमजोर नहीं होगी यदि वैध और अवैध बच्चों के बीच भेद समाप्त कर दिया जाता है।
अध्यक्ष महोदय : मेरा विचार है कि माननीय सदस्य अपने विचार विवाह संबंधी अध्याय के लिए आरक्षित रखें।
श्री ब्रजेश्वर प्रसाद : मैं विवाह संबंधी अध्याय पर अपने विचार व्यक्त नहीं कर रहा हूँ। मैं केवल कुछ आपत्तियों का अनुमान लगा रहा हूँ जो मेरे इस सुझाव पर उठाई जा सकती हैं कि वैध और अवैध बच्चों के बीच का भेद समाप्त कर दिया जाना चाहिए।