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श्री टी. हुसैन (बिहार) : अपनी सूचना के लिए क्या मैं जान सकता हूँ कि मेरे माननीय मित्र कानूनी शादी के खिलाफ हैं या नहीं?
श्री ब्रजेश्वर प्रसाद : यदि मुझे विवाह से संबंधित खण्डों पर अपने विचार रखने का अवसर दिया जाता है, तो इस भेद को स्पष्ट करने के लिए तैयार हूँ। मुझे नहीं लगता कि विवाह की संस्था कमजोर हो जाएगी यदि वैध और अवैध बच्चों के बीच का भेद मिटा दिया जाता है। क्योंकि विवाह का आधार क्या है? विवाह की संस्था जीवित क्यों है? यह हमारे मानस और हृदय की मनोवैज्ञानिक दुर्बलता ही है जो विवाह संस्था के जीवित रहने के लिए उत्तरदायी है। समाज में विवाह संस्था का अस्तित्व न तो यौनेच्छा की तुष्टि के लिए है और न ही संतति उत्पन्न करने के लिए। क्योंकि इन दोनों उद्धेश्यों को तो वैवाहिक बंधन से बाहर रहकर भी प्राप्त किया जा सकता है। मैं अवैध संतति का विरोधी हूँ क्योंकि यह गर्भपात, अभावग्रस्तता, वेश्यावृत्ति, अपराध, प्रगामी अवैध संतति, कालपूर्व जन्म, मृत-प्रसव, अपराध, शिशुहत्या, रति रोग एवं महिलाओं और बच्चों के प्रति क्रूरता का कारण है।
मैं एक ऐसे अनुच्छेद को अपना नैतिक समर्थन देने के लिए तैयार नहीं हूँ, जो हमारे समाज में किए जा रहे जघन्यतम अपराध को कायम रखना चाहता है।
* श्री बी. दास (उड़ीसा) : सबसे पहले तो मैं अपनी ओर से और उन सभी सुधारवादियों की ओर से जो इस सदन के सदस्य हैं इस सदन के बाहर के सुधारवादियों की ओर से डॉ. बी. आर. अम्बेडकर को हिन्दू कानून को संहिताबद्ध करने का साहसिक कदम उठाने पर बधाई देना चाहता हूँ। उन्होंने असीम धैर्य का परिचय दिया है। उन्हें हमारे युग का मनु कहा जा रहा है। लेकिन उन्होंने बुद्ध के सिद्धांतों का अनुसरण किया है और इस बात पर सहमत होकर सहिष्णुता दिखाई है कि फिलहाल केवल विवाह और विवाह-विच्छेद से संबंधित अध्यायों पर ही चर्चा की जाए। मैं इस कोड के विवाह और विवाह-विच्छेद संबंधी खण्डों का समर्थन करता हूँ।
उल्लेखनीय भाषण इस सदन में दिए जा चुके हैं। मेरे मित्र श्री गाडगिल ने इस विधेयक के पक्ष में उत्कृष्ट भाषण दिया। पं. कुंजरू ने भी उत्कृष्ट भाषण दिया। इस विधेयक के विरोध में दिए गए जो भाषण उल्लेखनीय हैं वे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सरदार मान और मेरे युवा मित्र पंडित गोविंद मालवीय ने दिए हैं।
* संसदीय वाद-विवाद, खंड XV भाग II, 20 सितंबर, 1951, पृष्ठ 2935-37