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श्री बी. दास : उन लोगों ने हमें संविधान पारित करने में मदद की है जो भारत की परम्परावादी और रूढि़वादी विचारधारा के हैं। उन्होंने हमें थोड़ी कमजोरी से ही सही, आजादी की लड़ाई में भी मदद की थी, जिसे हम इतने वर्षों तक लड़ते रहे। 1947 से हम सब आगे बढ़ रहे हैं। यदि अब हमारा आदर्श- वाक्य “आगे बढ़ो” है तो भारत या इसके किसी भी समुदाय चाहे वह हिन्दू, मुस्लिम या कोई और हो, की तरक्की और प्रगति को कोई रोक नहीं सकता। इसलिए उन्हें हमारे प्रति गहरा मतभेद दिखाने के बजाए इस विचार को मान लेना चाहिए कि एक राष्ट्र के रूप में भारत को प्रगति करनी चाहिए और यदि हम एशिया का पहला राष्ट्र हैं और विश्व में पहला राष्ट्र होने जा रहे हैं तो उन्हे हमारी तरक्की और प्रगति में सहायक होना चाहिए न कि हमें किसी तरह भयभीत करना चाहिए।
मैं अपना भाषण समाप्त करते हुए इस सदन में उपस्थित अपने रूढिवादी मित्रों को स्मरण कराना चाहूँगा कि हिन्दू कोड और विवाह कानून कोई नई बात नहीं हैं। हमने डॉ. हरि सिंह गौर अथवा डॉ. एम. आर. जयकर जैसे हाल ही के सुधारकों को भुला दिया है जिन्होंने हिन्दू कानूनों, विशेष रूप से विवाह से संबंधित कानूनों की पुरानी परम्पराओं और रीति-रिवाजों पर विशिष्ट कार्य किया है। अतः ऐसा कहने का कोई उपयोग नहीं कि डॉ अम्बेडकर ने हमारे रूढि़वादी मित्रों के सामने कोई बम फेंक दिया है और उन्हे हैरत में डाल दिया है हम तरक्की कर रहे हैं और डॉ. अम्बेडकर ने एक काम जरूर किया है। उन्होंने पूरी समस्या का सामना किया है और यह कानून टुकड़ों-टुकड़ों में बनाने का प्रयास नहीं किया। इसके बावजूद अपने रूढि़वादी मित्रों की बात मानते हुए यह सदन हिन्दू कोड बिल के केवल एक भाग को पारित करने के लिए लगभग सहमत हैं। मैं प्रस्ताव का समर्थन करता हूँ।
* डॉ. अम्बेडकर : मुझे लगता है कि यह इस सदन के इतिहास में और मेरे विचार से पिछले विधानमंडलों के इतिहास में एक असाधारण घटना है कि हम एकमात्र
खण्ड पर सात दिनों से भी अधिक समय से विचार-विमर्श कर रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि ऐसा पहले कभी हुआ है। लेकिन इस बात को ध्यान में रखते हुए कि अनेक सदस्यों ने यह बात कही है कि इस विधेयक ने उनके अंतःकरण को छुआ है, हमारे प्रधानमंत्री जी ने न्यायोचित भावना से उन्हें और अध्यक्ष महोदय ने भी हर सदस्य को इस विषय पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए अधिकतम समय दिया (एक माननीय सदस्यः गलत)। मुझे इससे कोई शिकायत नहीं है, क्योंकि यही बेहतर है कि हमें प्रत्येक व्यक्ति को, चाहे वह पक्ष में बोले या विरोध में, पूरा अवसर देना चाहिए, बजाए इसके कि जो सदस्य सरकार से मतभेद रखते हैं, वे यह भावना लेकर
* संसदीय वाद-विवाद, खंड XV भाग II, 20 सितंबर, 1951, पृष्ठ 2937-59