398 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
घर जाएं कि उनकी आवाज को दबा दिया गया। मुझे आशा है कि इस सच्चाई के बावजूद कि इस खण्ड पर विचार-विमर्श करने में सात महत्वपूर्ण दिन खर्च हुए हैं, जब इस खण्ड पर मतदान कराया जाता है तो किसी भी सदस्य को किसी भी बात को लेकर कोई शिकायत नहीं रहेगी। बाबू रामनारायण सिंह : मुझे है।
डॉ. अम्बेडकर : इस खण्ड पर चर्चा दरअसल दो भागों में हुई है। बहस का एक हिस्सा संसद के पिछले सत्र के दौरान हुआ था दूसरा इस बहस के दौरान, जिसे मैं पूरक चर्चा कहता हूँ, मैंने अब तक दिए गए भाषणों को यथासंभव ध्यानपूर्वक सुना है, इसके बावजूद, मुझे खेद है कि मेरे लिए यह ध्यान में रखना संभव नहीं है कि कौन सी नई बात इस पूरक चर्चा के दौरान उठाई गई, जो मूल चर्चा के दौरान उठाई नहीं गई थी। केवल एक नई बात जो मैंने इस पूरक चर्चा के दौरान देखी वह मेरे मित्र डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के भाषण में और मेरे दूसरे मित्र श्री मान के भाषण में थी। इसके अलावा केवल मुद्दों पर ही व्यापक स्तर पर विचार-विमर्श किया गया, जिन्हे संभवतः मूल चर्चा के दौरान भी उठाया गया था।
जहां तक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का संबंध है, मैं महसूस करता हूं कि उन्हें गंभीरता से लेने की कतई जरूरत नहीं है। मुझे लगता है कि उनका अपना दिमाग है ही नहीं। बाबू रामनारायण सिंह : आपका है?
डॉ. अम्बेडकर : मेरा है, निःसंदेह है।
जैसा कि इस सदन के माननीय सदस्यों को मालूम है वे भी चार वर्ष तक इसी सरकार में थे जिसके दौरान यह विधेयक तत्कालीन सरकार ने इस सदन के समक्ष रखा था। मुझे याद नहीं पड़ता कि इन चार वर्षों के दौरान जब डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी सरकार के सदस्य थे और जब सरकार ने यह विधेयक प्रायोजित किया था और इस सदन के समक्ष रखा था और इस सदन के सदस्यों न इसके कुछेक मुद्दों पर चर्चा भी की थी, तब मेरी जानकारी में मंत्रिमंडल की बैठकों में एक भी ऐसा अवसर नहीं आया, जब डॉ. मुखर्जी ने इस विधेयक पर सरकार से थोड़ा-सा भी मतभेद दिखाया हो।
श्री श्यामनन्दन सहाय (बिहार) : क्या माननीय मंत्रीजी बताना चाहेंगे कि वहाँ
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क्या हुआ था और क्या नहीं हुआ था?
डॉ. अम्बेडकर : मैं वही कह रहा हूँ। मुझे यह भी याद है कि पहले इस विधेयक