400 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
प्राचीन समाज लुप्त हो चुके हैं तो इसके नियम, इसकी सामाजिक संरचना इसके सिद्धांत भी अवश्य अच्छे होने चाहिए; अन्यथा यह जीवित नहीं रहता।
ऐसा नहीं है कि यह तर्क मैंने पहली बार सुना है। यह बात मैं लम्बे समय से सुनता आया हूँ और इसे मैंने न केवल आम आदमी के मुंह से सुना है बल्कि विशिष्ट स्थान रखने वाले लोगों से भी सुना है जिन्हें भारत का इतिहासकार कहा जाता है। यह तर्क हर समय उन लोगों ने प्रस्तुत किया जिन्हें इस समाज की प्राचीन संरचना की पुनीतता में आस्था है। मैं निःसंकोच कहता हूँ कि मैं भी भारतीय इतिहास का विद्यार्थी रहा हूँ, हालांकि मैं यह दावा नहीं कर सकता कि मैं हमारे विश्वविद्यालयों में इतिहास का अध्यापन करने वाले कई लोगों जितना अच्छा विद्यार्थी हूँ। मुझे विश्वास है कि मुझे भी भारतीय इतिहास की पर्याप्त समझ है और जो बात मैं कहना चाहता हूँ वह इस प्रकार है। क्या केवल जीवित रहना पर्याप्त है या हमें यह विचार करना ज्यादा जरूरी है कि हम किस स्तर पर जीवित रहे? कोई व्यक्ति युद्ध में अपने विरोधी से जाकर मिल जाता है और उसका खात्मा करके विजयी हो जाता है वह भी जीवित रहता है। एक व्यक्ति जो विरोधी को सामने देखकर कायरों की तरह भाग निकलता है वह भी जीवित रहता है। क्या विजेता के जीवित रहने का मूल्य और सम्मान कायर के जीवित रहने के समान है? मैं समझता हूँ कि हमें यह विचार जरूर करना चाहिए कि हिन्दू समाज किस स्तर पर जीवित रहा है। (एक माननीय सदस्यः योग्यतम की जीवंतता) जी हां, परंतु परिस्थितियों के आधार पर। अपने मित्रों
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से मैं यह कहने के लिए माफी चाहता हूँ कि जब मैं भारत का इतिहास देखता हूँ तो मैं देखता हूँ कि हम उन लोगों के रूप में जीवित रहे हैं जिन्हें अधीनता में रखा गया, पराजित किया गया और गुलाम बना लिया गया था। (एक माननीय सदस्य :
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किसके साथ ऐसा नहीं किया गया?) जी, हां। मेरे माननीय मित्र ने यह प्रश्न पूछा है कि “किसके साथ ऐसा नहीं किया गया?“ अनेक देश और अनेक समुदाय हैं जिन्हें युद्ध में पराजय का मुंह देखना पड़ा था और गुलाम बना लिया गया था, लेकिन मैं अपने माननीय मित्र को स्मरण कराना चाहूँगा कि यदि वे युद्धों में परास्त लोगों का इतिहास पढ़ें तो वे महसूस करेंगे कि विश्व के दूसरे भागों में पराजित लोगों ने कभी न कभी उठकर संघर्ष किया और स्वतंत्रता प्राप्त की। मैंने इस देश में ऐसा कुछ होते हुए नहीं देखा। इसलिए यह कहना कि अन्य देश जहां लुप्त होकर इतिहास के पन्नों में समा गए हैं, वहीं हम हैं जो आज भी जीवित हैं। यह बात जिस सामाजिक ढांचे में हम रह रहे हैं उसकी अच्छाई या सुदृढ़ता के प्रति मुझे संतुष्ट नहीं करती। यह कहा जाता है कि हिन्दू समाज अत्यंत प्रगतिशील समाज है। यह एक ऐसा तर्क है जिसका मेरे माननीय मित्र डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने विस्तार से विवेचन किया और उन्होंने उल्लेख किया कि हिन्दू समाज द्वारा बुद्ध जैसे आत्यंतिक सुधारवादी