हिंदू कोड-जारी - Page 416

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को एक महान व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार किया गया और न केवल एक महान व्यक्ति के रूप में स्वीकार किया, वरन् उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों में से कुछेक को अपनाया और स्वीकार भी किया।

अपने विरोधियों की कुछ बातों को ग्रहण कर लेना भी निःसंदेह हिन्दू समाज का एक महान गुण है। लेकिन जो बात मैं कहना चाहता हूँ वह इस प्रकार है। अपने विरोधियों के मतों- सिद्धांतों को ग्रहण करने के बाद क्या हिन्दू समाज ने अपने सामाजिक ढांचे को कभी बदला? बुद्ध का उदाहरण देकर मैं अपनी स्थिति स्पष्ट करता हूँ। उन्होंने क्या उपदेश दिया? उन्होंने समानता का उपदेश दिया। वे चतुर्वर्ण व्यवस्था के घोर विरोधी थे। वे वेदों में आस्था के घोर विराधी थे, क्योंकि वे तर्क में विश्वास रखते थे न कि किसी पुस्तक के अचूक होने में। अहिंसा में उनका विश्वास था; ब्राह्मणवादी समाज ने कुछ बातों को स्वीकार कर लिया। उसने क्या स्वीकार किया? उसने अहिंसा के सबसे हानिरहित मत का वरण कर लिया। समानता के उनके सिद्धांत का वरण करने के लिए कोई तैयार नहीं था और न किसी ने किया; बल्कि उसका विरोध किया। यह जरूर है कि कुछेक हानिरहित छोटी-मोटी बातों को अपना लिया परन्तु इसके बाबजूद उन्होंने उस मुख्य बात को छुआ तक नहीं जिस पर सभी एकजुट थे अर्थात् चतुर्वर्ण व्यवस्था को बनाए रखना। यही कारण है कि समाहित कर लेने और अपना लेने के गुण के बावजूद वह वही हैं जहाँ रहते आए हैं। हमने अनेकानेक वर्षों तक प्रतीक्षा की है कि हिन्दू समाज इस देश में जन्मे और इस देश से बाहर जन्मे महान व्यक्तियों के द्वारा दिए गए उपदेशों में निहित सिद्धांतों को आत्मसात करने के परिणामस्वरूप अपना सामाजिक ढांचा बदलेगा। हम लोगों में से अधिकांश लोग, मैं तो अपनी बात करता हूँ, पूरी तरह से निराश हैं। हिन्दू समाज चाहे जो कुछ अपना ले परन्तु वह शूद्रों को गुलाम बनाकर रखने और स्त्रियों को अधीन रखने के अपने सामाजिक ढांचे का त्याग कभी नहीं करेगा। यही कारण है कि अब उनके लिए कानून को आगे आना होगा ताकि समाज प्रगति कर सके।

पंडित मालवीय : वह बताइए जो बुद्ध नहीं कर सके।

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डॉ. अम्बेडकर : लोग कहते आ रहे हैं कि हिन्दू समाज बदलता रहा है। मैं जो प्रश्न करना चाहता हूँ वह इस प्रकार है। क्या यह परिवर्तन प्रगति की दिशा में है या यह परिवर्तन दूसरी दिशा में है? जिस किसी ने भी आर्य समाज का शुरूआत से लेकर आज तक का इतिहास पढ़ा है और यदि वह इतिहास का निष्पक्ष विद्यार्थी है तो उसे स्वीकार करना पड़ेगा कि जो कुछ भी परिवर्तन हुआ है, तो उसमें गिरावट आई है। जैसा कि सब जानते है, आर्यों में कोई जाति-व्यवस्था नहीं थी। किसी प्रकार की वर्ण व्यवस्था जरूर रही परन्तु वर्ण-व्यवस्था अन्तर्जातीय विवाह के आड़े