403
श्री श्यामानंदन सहाय : आप टिप्पणी न करें तो ही अच्छा है।
अध्यक्ष महोदय : ऑर्डर, ऑर्डर।
डॉ. अम्बेडकर : मेरे आदर्श तो संविधान जनित हैं, जो हमने निर्धारित किए हैं। संविधान की उद्देशिका में स्वतंत्रता, समानता और बंधुता की बात कही गई है। अतः इस देश में मौजूद प्रत्येक संस्था की जांच करने के लिए हम बाध्य हैं क्या वह संविधान में निर्धारित सिद्धांतां का पालन करती है। अब जहां तक आपके सांस्कारिक विवाह का संबंध है, मैं माफी चाहूँगा कि मेरे मन में यह बात मुझे अच्छी तरह मालूम है कि विवाह संस्था की निष्पक्ष, ईमानदार और स्वतंत्र भावना से जांच करने वाला कोई भी व्यक्ति इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचेगा कि हमारा सांस्कारिक विवाह न तो स्वतंत्रता के आदर्श पर खरा उतरता है और न ही समानता के। विवाह का सांस्कारिक आदर्श क्या है? विवाह के सांस्कारिक आदर्श का यथासंभव कम से कम शब्दों में वर्णन किया जाए तो यह पुरुष के लिए बहुविवाह और स्त्री के लिए निरंतर गुलामी है।
एक माननीय सदस्य : अत्युत्तम वर्णन है।
डॉ. अम्बेडकर : ऐसा इसलिए कि स्त्री किसी भी स्थिति में पुरुष से स्वतंत्रता प्राप्त नहीं कर सकती, चाहे वह कितना ही निष्ठुर हो, चाहे कितना ही अवांछित। एक प्रश्न मैं इस सदन के सामने रखना चाहता हूँ। हम दासता के पक्ष में हैं या हम स्वतंत्र श्रम के पक्ष में हैं? हम किसके पक्ष में हैं? अब देखिए, कि सभी आर्थिक मामलों में हम हमेशा इस बात पर जोर देते आए हैं कि श्रम स्वतंत्र होना चाहिए। गुलामी हम बर्दाश्त नहीं करेंगे।
एक माननीय सदस्य : क्या यह गुलामी है?
डॉ. अम्बेडकर : गुलामी और मुक्त श्रम के बीच क्या अंतर है? मेरा ख्याल है कि यदि आप गहराई से विचार करें तो आप इस नतीजे पर पहुंचेंगे कि मुक्त श्रम का अर्थ है करार को तोड़ने की आवश्यकता उत्पन्न होने पर करार को तोड़ने की योग्यता और क्षमता रखना। श्री आर. के. चौधरी (असम) : क्या यह एक करार है?
डॉ. अम्बेडकर : जी, हां। मैं इसी बात पर अभी आऊंगा।
इसलिए यदि सांस्कारिक विवाह के अंतर्गत किसी स्त्री को उसकी स्वतंत्रता चाहिए तो उसको स्वतंत्रता प्राप्त करने की शर्तों के लिए आप चाहे जो सीमा रेखा खींचें, तो यह विधेयक जिस रूप में है, इसमें विवाह-विच्छेद के लिए निर्धारित शर्तों को सीमित