404 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
करने के लिए इस सदन के किसी भी पक्ष के किसी भी सदस्य द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव पर मैं विचार करने के लिए तैयार हूँ। परन्तु यदि आपका आशय स्वतंत्रता प्रदान करने से है और आप उसे उस स्वतंत्रता से वंचित नहीं कर सकते, क्योंकि आपने इसे संविधान में शामिल किया है और प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्रता और समानता की गारंटी देने वाले संविधान की सराहना की है तो आप इस संस्था को वैसा नहीं रख सकते जैसी कि यह अभी है। यही कारण है कि हम यह विधेयक लेकर आए हैं और इसलिए नहीं कि हम किसी और देश के लोगों का अनुकरण करना चाहते हैं या हम अपने प्राचीन आदर्शों का अनुसरण करना चाहते है जो मेरे मतानुसार पुरातनपंथी हैं और किसी के लिए भी उन्हें व्यवहार में लाना असंभव है।
डॉ. सी. डी. पाण्डे (उत्तरप्रदेश) : हम इस विधेयक का समर्थन करने के लिए तैयार हैं, लेकिन हम यह भर्त्सना नहीं चाहते। माननीय मंत्री जी के लिए इस विषय पर बोलने और ऐसी भर्त्सना करने का क्या औचित्य है, मैं नहीं जानता।
एक माननीय सदस्य : हिन्दू धर्म को बदनाम क्यों कर रहे हैं?
डॉ. अम्बेडकर : अब मैं खण्ड 2 में किए गए उन विशिष्ट संशोधनों पर आता हूँ जिन्हें विभिन्न सदस्यों के द्वारा सभा-पटल पर रखा गया है।
श्री कृष्णानंद राय (उत्तरप्रदेश) : सदन विवाह-विच्छेद और एक विवाह के पक्ष में है, लेकिन इस प्रकार की भर्त्सना के पक्ष में नहीं है।
डॉ. सी. डी. पाण्डे : हम इन प्रावधानों के पक्ष में हैं लेकिन हम ये गालियां और भर्त्सना नहीं चाहते।
डॉ. अम्बेडकर : यदि यह सब आप लोगों ने पहले ही कहा होता तो मैं यह भाषण ही नहीं देता और इस विधेयक पर सात दिन खर्च नहीं हुए होते।
प्रधानमंत्री (श्री जवाहरलाल नेहरू) : कुछ माननीय सदस्यों की नाजुक भावनाएं देखकर मुझे आश्चर्य होता है। हमें एक के बाद एक भाषणों को सुनना पड़ा और ऐसी-ऐसी बातें कही गई हैं, जिनसे हमें गहरी चोट पहुंची है। जब उन पर आपत्ति नहीं की गई तो मेरे ख्याल से जो डॉ. अम्बेडकर से सहमत नहीं हैं उन्हें अब एतराज नहीं होना चाहिए।
पंडित मैत्रा : हम डॉ. अम्बेडकर को पूरी तन्मयता से सुनते रहे हैं लेकिन यह जो भर्त्सना है और जिन सर्वोच्च आदर्शों को हमने दिलों में बसाया है उन पर उनके विचार हम नहीं चाहते। सदस्यों की धार्मिक संवेदनाओं को चोट पहुंचाए बिना भी प्रावधानों का समर्थन किया जा सकता है।