हिंदू कोड-जारी - Page 420

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अध्यक्ष महोदय : मुझे नहीं लगता कि इतना उत्तेजित होने की कोई जरूरत है। जैसा कि प्रधानमंत्री जी ने कहा, कई माननीय सदस्यों ने भाषण दिए और कई तरह की बातें कहीं; इसलिए स्वाभाविक है कि जब माननीय विधि मंत्री जी उत्तर दे रहे हैं तो वे कुछ वक्तव्य देंगे और उनकी बातें भी सुनी जानी चाहिएं।

डॉ. अम्बेडकर : अब मैं इस खण्ड में किए गए विशिष्ट संशोधनों पर आता हूँ जिन्हें सभापटल पर रखा गया है जिन्हें आप भी देख सकते हैं (व्यवधान)।

अध्यक्ष महोदय : मैं चाहता हूँ कि सदस्यगण आपस में बातें न करें।

डॉ. अम्बेडकर : एक सामान्य संशोधन है कि इस विधेयक को ऐच्छिक बनाया जाना चाहिए। यह संशोधन विभिन्न तरीकों से और विभिन्न रूपों में किया गया है। एक रूप में इसका तात्पर्य यह है कि जिन हिन्दुओं पर यह विधेयक लागू किया जा रहा है उन्हें विकल्प दिया जाना चाहिए कि इसे वे लागू कराना चाहते हैं या लागू नहीं कराना चाहते। यही संशोधन जिस दूसरे रूप में आया है वह इस प्रकार है कि यदि दूसरे लोग, उदाहरण के लिए मुसलमान लोग, जिन पर यह विधेयक लागू नहीं होता, चाहते हैं कि यह विधेयक उन पर लागू किया जाना चाहिए तो इसमें इस आशय का प्रावधान किया जाए।

अन्य रूप, जिसमें यह संशोधन किया गया है वह यह है कि इस विधेयक को लागू करना अथवा नहीं करना राज्यों पर छोड़ दिया जाना चाहिए। अब मैं जिन तीनों रूपों में इसे प्रस्तुत किया गया है उन सामान्य संशोधनों की बात करूंगा।

जहां तक इस विषय के प्रथम पहलू का संबंध है कि हिन्दुओं पर भी इसे लागू करना वैकल्पिक होना चाहिए। पिछली बार उपाध्यक्ष ने यह उल्लेख करते हुए कई सदस्यों की सहायता की थी ऐसा करने का एक पूर्वोदाहरण भी मौजूद है। मेरा

ख्याल है कि माननीय सदस्यों को स्मरण होगा कि उन्होंने शरियत अधिनियम और

खोजा-मोमिन अथवा खोजा अधिनियम का उल्लेख किया था। और इसलिए उन्हांने कहा था कि जहां तक हिन्दुओं पर यह विधेयक लागू करने का प्रश्न है, इस प्रकार का प्रावधान करने में कोई खतरा या कोई अनोखी बात नहीं है। मैंने यह जांच कराने में काफी समय लिया कि क्या माननीय उपाध्यक्ष- माफ करें, वे इस समय उपस्थित नहीं हैं - की कहीं बात वास्तव में सच है। और मुझे लगता है कि वे इस बारे में कुछ भूल गए हैं।

श्री श्यामनन्दन सहाय : आप उपाध्यक्ष महोदय के निर्णय की आलोचना कर रहे हैं या आप श्री अनंतशयनम अय्यंगर की टिप्पणी की आलोचना कर रहे हैं?