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पेश किया था और हुआ यह कि उन्होंने इसे “खण्ड” कहने के बजाए इसके लिए ”अधिनियम“ शब्द प्रयुक्त किया था। मेरे मित्र श्री काजमी ने इस अशुद्धि को दूर किया, जिन्होंने 1943 में यह विधेयक प्रस्तुत किया और “अधिनियम” के स्थान पर ”खण्ड“ शब्द रखा। अतः यह आधार कि इस मामले का पूर्वोदाहरण मौजूद है, मेरा निवेदन है कि यह बात आधारहीन है।
(मध्याह्न 12 बजे)
श्री जे. आर. कपूर : मैं कानून मंत्री जी के ध्यान में यह बात लाना चाहता हूँ कि 1937 के इस अधिनियम से पूर्ववर्ती कच्छी मेमन अधिनियम वापस ले लिया गया था जिसके अनुसार विकल्प दिया गया था और उपाध्यक्ष महोदय ने सदन के सदस्य के रूप में जिस बात की ओर ध्यान दिलाया था कि दरअसल एक कानून अनेक वर्षों तक लागू रहा था जिसमें विकल्प प्रदान किया गया था।
डॉ. अम्बेडकर : वह पहले की बात है, उसे हटा दिया गया था।
श्री जे. आर. कपूर : यही बात है कि कई वर्षां तक इस प्रकार का कानून लागू था। यही बात थी जो उन्होंने कही थी।
डॉ. अम्बेडकर : हम इस प्रश्न पर चर्चा कर रहे हैं कि क्या 1937 के अधिनियम में विकल्प दिया गया था। बात यह है।
श्री जे. आर. कपूर : श्री अय्यंगर का कहना था कि 1923 के अधिनियम में विकल्प दिया जाता था।
डॉ. अम्बेडकर : मुझे माफ करें, मैं मान नहीं सकता।
अध्यक्ष महोदय : यदि भाषण में कोई विसंगति है तो सदस्यगण बाद में भी इस ओर ध्यान दिला सकते हैं जब इसके लिए पर्याप्त अवसर होगा।
श्री अमोलख चंद : अब नवीनतम स्थिति क्या है?
डॉ. अम्बेडकर : कोई विकल्प नहीं है।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : विकल्प लम्बे समय तक उपलब्ध था।
डॉ. अम्बेडकर : कच्छियों के लिए।
विकल्प प्रदान करने का मैं प्रस्ताव करूंगा। पूर्वोदाहरणों के अलावा, इसके परिणाम क्या होंगे? मान लीजिए कि विकल्प देने का यह प्रस्ताव हम स्वीकार कर लेते हैं। माननीय सदस्यों को याद होगा कि बम्बई और मद्रास जैसे कुछ राज्य हैं,