हिंदू कोड-जारी - Page 424

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है तो सभी जगह होनी चाहिए ताकि कोई भी व्यक्ति दूसरे राज्य में जाकर अपने राज्य की जहां वह सामान्यतः रहता है, का कानून न तोड़े। इसलिए इस मामले में या तो कोई कानून नहीं होना चाहिए और जैसी स्थिति है वही रहनी चाहिए; यदि आप कानून चाहते हैं तो वह अखिल भारतीय कानून हो ताकि कोई भी स्त्री या पुरुष कानून को तोड़ न सके।

तीसरी कठिनाई यह है कि हालांकि सभापटल पर इस आशय के संशोधन रखे गए हैं कि विकल्प दिया जाना चाहिए लेकिन यह उल्लेख नहीं किया गया है कि विकल्प का स्वरूप क्या हो। महिलाओं को विकल्प का अधिकार होगा या नहीं? यदि पिता विकल्प देता है कि यह कानून उस पर लागू होता है तो क्या यह विकल्प उसके पुत्र या संतति पर भी लागू होता है। यदि पति इस कानून के अंतर्गत विकल्प देता है तो क्या यह उसकी पत्नी पर भी महज इसलिए लागू होगा कि वह उसकी पत्नी है? यदि पति इसे स्वयं पर लागू नहीं करता तो क्या पत्नी भी ऐसा करने के लिए स्वतंत्र है? श्री भारती (मद्रास) : पूरा भ्रम।

डॉ. अम्बेडकर : यदि यह संशोधन स्वीकार कर लिया जाता है तो सब अस्त-व्यस्त हो जाएगा।

श्री जे. आर. कपूर : खण्ड 2 के परंतुक में क्या कहा गया है?

डॉ. अम्बेडकर : माफ करें, मैं ऐसा कोई परंतुक नहीं जोड़ सकता। हमारा कानून कुछ विरूपित हो सकता है लेकिन इसे पूरी तरह सौन्दर्यहीन भी नहीं होना चाहिए। यह देखने में अच्छा होना चाहिए।

अब मैं बहस के दूसरे पहलू पर आता हूँ अर्थात् अन्य लोगों को यह कानून उन पर लागू करने देना। मुझे इस बारे में बात नहीं करनी चाहिए थी, लेकिन चूँकि डॉ. मुखर्जी ने कहा है कि इस कानून को मुसलमानों पर लागू नहीं किया गया। उन्होंंने सरकार पर आरोप लगाया कि जहां तक मुस्लिम समुदाय का प्रश्न है, सरकार ऐसा कानून कभी नहीं ला सकती क्योंकि सरकार ईमानदार नहीं है या उसमें साहस नहीं है जहां तक इस मामले का संबंध है, सदस्यों ने कहा है कि हम एक ऐसा कानून बना रहे हैं जो भेदभावपूर्ण है और इसका कारण भी सरल है कि आज हिन्दू को एक से अधिक महिलाओं से विवाह करने का अधिकार है और मुसलमानों को चार विवाह करने का; लेकिन हम हिन्दुओं का अधिकार वापस ले रहे हैं जबकि मुसलमानों का अधिकार अप्रभावित है। इसे वह भेदभावपूर्ण कह रहे हैं।