हिंदू कोड-जारी - Page 425

410 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मैं सदस्यों का ध्यान संविधान के अनुच्छेद 25 की ओर सादर आकृष्ट करना चाहता हूँ जिसमें कहा गया है कि :-

”लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य तथा इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान अधिकार होगा।“

मैं सदस्यों का ध्यान “धर्म को अबाध रूप से मानने और आचरण करने का अधिकार” शब्दों की ओर दिलाना चाहता हूँ। इस समय मैं धर्म के प्रचार की बात नहीं कर रहा हूँ।

पिछली बार जब मैं इस विधेयक पर बोल रहा था, मैंने बहुत स्पष्ट रूप से कहा था कि सौभाग्य से या दुर्भाग्य से, हमारे देश में किसी धर्म विशेष को मानने के साथ-साथ उस व्यक्ति का वैयक्तिक कानून भी आ जाता है। आप इस स्थिति से बच नहीं सकते। इसी प्रकार जब आप किसी मुसलमान से यह कहते हैं कि वह अपने धर्म को मानने और आचरण करने के लिए स्वतंत्र है तो हम व्यावहारिक रूप से उसे अपने वैयक्तिक कानून का आचरण करने हक भी दे देते हैं। इस तथ्य को देखते हुए कि संविधान विभिन्न सम्प्रदायों को उनके धर्म का आचरण करने की अनुमति देता है और संयोग से उनके वैयक्तिक कानून की भी अनुमति देता है तो एक सम्प्रदाय को उसका स्वयं का कानून रखने और वह जिस तरह से चाहे उसमें संशोधन करने की अनुमति देने और दूसरे सम्प्रदाय के कानून के साथ अलग व्यवहार करने अथवा उसमें संशोधन करने में भेदभावपूर्ण कुछ भी नहीं है।

पंडित ठाकुर दास भार्गव (पंजाब) : हिन्दू कानून के अनुसार एक व्यक्ति एक

Bk dqj
kkx Zo

से ज्यादा महिलाओं से विवाह कर सकता है, इस्लामी कानून के अनुसार भी व्यक्ति को एक से ज्यादा पत्नियां रखने की पात्रता है, परन्तु किसी मुसलमान पर एक से ज्यादा पत्नियां रखने की बाध्यता नहीं है और न ही किसी हिन्दू को एक से ज्यादा विवाह करने की बाध्यता है। इस मुद्दे पर दोनों का वैयक्तिक धर्म एक समान है। इसी प्रकार किसी मुसलमान को बाल-विवाह करने का आदेश नहीं है, न ही किसी हिन्दू को बाल-विवाह का आदेश है, क्योंकि इस मुद्दे पर स्मृति तथा हदीस दोनों एक ही बात कहते हैं। इसीलिए बाल-विवाह अधिनियम मुसलमानों पर भी लागू किया गया था। आज यदि हम यह कानून उन पर लागू करते हैं तो यह मुस्लिम कानून या शरियत कानून के खिलाफ नहीं है। इसलिए जहां तक अनुच्छेद 25 का प्रश्न है, आप इसे ........

डॉ. अम्बेडकर : मैं दूसरी बहस पर बात कर रहा हूँ कि हम भेदभाव कर रहे