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अध्यक्ष महोदय : मैं नहीं चाहता कि बहस के दौरान माननीय सदस्य व्यवधान उत्पन्न करते रहें।
श्री भट्ट : यह तो मिठाई है जो कई दिनों तक चल सकती है।
डॉ. अम्बेडकर : जहां तक विकल्प के दूसरे भाग का संबंध है कि इसे राज्यों पर छोड़ दिया जाना चाहिए, इसका विवेचन मैं पहले ही कर चुका हूँ। मान लीजिए कि कुछ राज्य ऐसे कानून अधिनियमित कर देते हैं और कुछ राज्य नहीं करते, तो जिस अव्यवस्था के बारे में मैंने बताया था वह उत्पन्न हो जाएगी और मुझे नहीं लगता कि हम ऐसा कोई विकल्प राज्यों को दे सकते हैं, जिसके परिणामस्वरूप विवाह और विवाह-विच्छेद जैसे मूलभूत मामलों में अव्यवस्था फैले। इस संबंध में मैं कहना यह चाहता हूँ कि हांलांकि यह सच है कि राव समिति में भाग -ख राज्यों का दौरा नहीं किया था, इसके बावजूद, जब अनौपचारिक सम्मेलन हुआ था, मैंने भाग-ख राज्यों के कुछ प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित करने का ध्यान रखा था। उनमें सौराष्ट्र के मुख्य न्यायाधीश थे, मैसूर के एडवोकेट जनरल थे, और मेरे ख्याल से........
श्री भट्ट : भाग-ख राज्यों का प्रतिनिधित्व करने के लिए सौराष्ट्र के मुख्य न्यायाधीश को कैसे बुलाया गया? वे तो राज्य की सेवा में थे।
डॉ. अम्बेडकर : वे वहां के हालात के बारे में जानते हैं।
तो हमने यह किया है। अब मैं सिक्खों के प्रश्न पर आता हूँ। मेरे मित्र श्यामनंदन सहाय कहीं चले गए हैं ........
श्री श्यामनंदन सहाय : मैं यहीं हूँ डॉ. अम्बेडकर, मैं यहीं पर हूँ।
डॉ. अम्बेडकर : अब मैं अपने मित्र श्री भूपेन्द्र सिंह मान द्वारा उठाए प्रश्न पर आता हूँ। उनका संशोधन यह है कि यह विधेयक सिखों पर लागू नहीं किया जाना चाहिए। ठीक है। मुझे व्यक्तिगत तौर पर इस संशोधन के बारे में कुछ नहीं कहना है क्योंकि यह हमारे मित्र श्री नजीरुद्दीन अहमद द्वारा रखे गए अन्य संशोधनों जिनमें बौद्ध, जैन, सिखों इत्यादि को छोड़ दिया गया है उनकी तुलना में यह अलग संशोधन नहीं है। किसी के लिए भी अपना दृष्टिकोण सामने रखना बिल्कुल विधिसम्मत है लेकिन मेरा विचार है कि माननीय सदस्य मेरी इस बात से सहमत होंगे कि उनके भाषण का लहजा बहुत अरुचिकर था और इससे मुझे बहुत ठेस पहुंची है। सरदार बी. एस. मान : उठते हैं -
उपाध्यक्ष महोदय : मैं नहीं चाहता कि माननीय सदस्य उनके भाषण में रुकावट डालें।