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हो हमें एकजुट होने का प्रयास करना चाहिए और हमें हर समय वैमनस्य के बीज नहीं बोने चाहिए। जब एकजुट होने जैसी कोई बात इस सदन के सामने आती है और यदि कोई खड़े होकर यह कहता है कि ”हम इस तबके में नहीं आते हैं और हम इस कानून से नियंत्रित नहीं होना चाहते हैं........
सरदार हुकम सिंह (पंजाब)ः आपने तब राष्ट्रपति जी से अपील क्यों नहीं की
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जब वे घोषणा कर रहे थे कि अनुसूचित जातियां कौन-कौन सी होंगी? उन्होंने ही यह भेद किया है।
डॉ. अम्बेडकर : ऐसा उनकी उदार भावना के कारण किया गया होगा, यदि आप याद करें कि क्या हुआ था।
अब यही बात है जो मुझे पसंद नहीं है। मेरे मतानुसार हम सभी को एकजुट होने का प्रयास निष्ठापूर्वक करना चाहिए, चाहे जो कुछ हो। किसी का विश्वास ईश्वर में है तो कोई आत्मा में विश्वास करता है। ये सब आध्यात्मिक मामले हैं। परन्तु क्या यह वांछनीय नहीं कि जहां तक हमारे विश्वास का संबंध है, हमारे बीच मतभेद होने के बावजूद हमें कानून की एक ऐसी प्रणाली तैयार करने की कोशिश करनी चाहिए जो हमारे अन्तर-संबंधों पर बाध्यकारी हो?
सरदार हुकम सिंह : क्या यह आपसे शुरू नहीं होना चाहिए?
डॉ. अम्बेडकर : आप हर समय यह क्यों कहते रहते हैं कि ”मैं अलग हूँ। मुझ पर यह बात लागू नहीं होती और मुझ पर वह बात लागू नहीं होती इसलिए अपना कानून मुझ पर बाध्यकारी मत बनाइये“। यही मेरे विरोध का मुद्दा है।
श्री ए. सी. शुक्ला : स्वभाव अलग-अलग होता है।
डॉ. अम्बेडकर : मेरे माननीय मित्र सरदार मान के आरोप में शिकायत यह है कि इस मामले में सिखों के साथ विचार-विमर्श नहीं किया गया है। इस बात पर मेरा उत्तर दो तरफा है। यदि सिखों के साथ विचार-विमर्श नहीं किया गया तो मेरा तर्क यह है कि उनके साथ विचार-विमर्श करने की जरूरत ही नहीं थी ........ सरदार बी. एस. मान : ओह।
डॉ. अम्बेडकर : मुझे मेरी बात कहने दीजिए क्योंकि कानून हमेशा यह मानता आया है कि सिख कानून के प्रयोजनार्थ हिन्दू हैं। मैंने मुल्ला की “हिन्दू लॉ” पढ़ी है जो एक छोटी-सी पुस्तक है और यदि मेरे माननीय मित्र उस पुस्तक में संशोधन करने के लिए देश की विधानसभाओं द्वारा पारित कुछेक अधिनियम देखें तो उन्हें कई