हिंदू कोड-जारी - Page 431

416 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अधिनियम मिलेंगे। परंतु मैं अपने माननीय मित्र से कहना चाहूँगा कि वे मुझे दिखाएं कि क्या इस संसद द्वारा हिन्दू कानून में कोई संशोधन करने के लिए अधिनियम किसी भी कानून जिन्हें सिखों पर भी लागू किया गया- के संबंध में क्या कभी सिखों के साथ परामर्श किया गया था अथवा क्या कभी सिखों को छोड़ दिया गया था।

सरदार हुकम सिंह : क्योंकि यहां हमेशा रिवाज ही चलता है।

डॉ. अम्बेडकर : मुझे ऐसे विचार-विमर्श का कोई उदाहरण नहीं मिलता। हिन्दू कानून में संशोधन करने के लिए जब कभी कोई कानून पारित किया गया, इसे उन व्यक्तियों पर लागू किया गया है जिन्हें न्यायिक व्याख्या के अनुसार ”हिन्दू“ शब्द में शामिल किया जाता है।

पंडित मैत्रा : तो इसे यहां रखने की क्या जरूरत है?

डॉ. अम्बेडकर : क्योंकि आप जैसे लोग संदेह कर सकते हैं।

अब मैं दूसरे भाग पर आता हूँ और यह सिद्ध करना चाहता हूँ कि यह आरोप तथ्यों पर आधारित नहीं है कि सिखां के साथ विचार-विमर्श नहीं किया गया था। राव समिति ने जब दौरा किया था और लाहौर गई थी तब उसके द्वारा लिए गए साक्ष्य का अध्ययन करने का कष्ट मैंने किया है। मैंने पाया कि ये लोग समिति के समक्ष उपस्थित हुए थे अथवा उन्हांने बयान दिए थे। पहले व्यक्ति जिनका मैं नाम लेना चाहता हूँ वे हैं लाहौर उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति तेजा सिंह। उन्होंने पंजाब उच्च न्यायालय के सदस्य की हैसियत से राव समिति को एक लिखित वक्तव्य दिया था। मैंने इसके मुख्य अंश पढे़ हैं, परन्तु मैंने जस्टिस तेजा सिंह का एक भी ऐसा वक्तव्य नहीं देखा कि सिखों पर यह कानून लागू नहीं किया जाना चाहिए। मैं नहीं जानता कि क्या मेरे माननीय मित्र यह स्वीकार करते हैं कि जस्टिस तेजा सिंह को सिख समुदाय के नाम पर कुछ कहने का अधिकार है।

दूसरे सज्जन जिनका नाम मुझे रिकार्ड में मिला है वे सरदार वरयाम सिंह हैं। वे अकाली दरबार के प्रतिनिधि बनकर आए थे और इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने कहा कि यह विधेयक सिखों पर लागू नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि उनका कहना था कि सिख कुछ ज्यादा ही आजाद किस्म के लोग हैं।

सरदार हुकम सिंह : ये महानुभाव कौन थे? क्या उनके बारे में कोई ब्यौरा दिया गया है।

डॉ. अम्बेडकर : अकाली दरबार के सचिव - यही ब्यौरा है, जो रिकार्ड में उनके बारे में दिया गया है।