418 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
विधायी विभाग, नई दिल्ली को भेजे गए दिनांक 3 अक्तूबर, 1947 के पत्र सं. 211 का सारांश आपको बताता हूँ। उस पत्र में जो वक्तव्य है वह इस प्रकार है :-
“मुझे लाहौर न्यायाधिकार उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार के फलां-फलां पत्र की प्रति अग्रेषित करने का निदेश हुआ है, जिसमें माननीय न्यायाधीशों आदि के विचार सूचित किए गए हैं। पंजाब सरकार ने आयुक्तों और उपायुक्तों, हाई कोर्ट बार एसोसिएशन तथा पांच मंडल मुख्यालयों और नौ चुनिंदा गैर-सरकारी संगठनों, जिन्हें हिंदू और सिख समाज के प्रतिनिधि संगठन माना जाता है, के विचार आमंत्रित किए थे। इन संगठनों में से केवल एक संगठन -श्री सनातन धर्म प्रतिनिधि, लाहौर ने उत्तर दिया है।”
मुझे नहीं लगता कि इसे देखते हुए मेरे माननीय मित्र यह कह सकते हैं कि सिक्ख समुदाय की राय जानने का कोई प्रयास नहीं किया गया था। मेरे माननीय मित्र ने यह भी कहा कि जिन सात सदस्यों से परामर्श किया गया था, उनमें से छह ने इसका विरोध किया था। वे इस बारे में कुछ और भी जानते होंगे। तथापि मुझे यह कहने का हक है कि मेरे माननीय मित्र के भाषण शुरू करने से पहले मैंने एक या दो बार उनसे बातचीत की थी। उन्हांने मुझसे कहा था कि वे आनन्द विवाह या पारम्परिक अनुष्ठान का उल्लेख करना चाहते हैं और मैंने उन्हें कहा था कि यद्यपि हम यह विधेयक पारित कर रहे हैं तथापि हम आनंद विवाह अधिनियम का निरसन नहीं कर रहे हैं, जिसे विधानसभा ने कतिपय अनुष्ठानों को नियमित करने के उद्देश्य से पारित किया था, जिनका पालन सिक्ख समुदाय विवाह करते समय करता है और मेरा विचार था कि वह इससे पूरी तरह संतुष्ट हैं। परन्तु यह हो सकता है कि कुछ और कारण उभर कर सामने आए हैं, जिनके कारण उन्होंने अपनी सुप्त भावनाओं को व्यक्त किया, जो अन्यथा उनके हृदय में दबी रह जातीं।
मेरे माननीय मित्र ने डॉ. बक्शी टेकचन्द का निर्णय पढ़कर सुनाया- जो 10 लाहौर काबुल सिंह मामले में दिया गया था। मैंने इस मामले के तथ्यों और मामले के तर्काधार की जांच की है। विवाद का मुद्दा केवल यही था कि क्या एक जाट सिख और एक मजहबी स्त्री के बीच विवाह कानूनी है अथवा नहीं। दूसरे पक्ष द्वारा यह तर्क दिया गया था कि यह कानूनी विवाह नहीं है क्योंकि जाट उच्च वर्ग का था और स्त्री एक निम्न वर्ग की थी और अन्तर्जातीय विवाह करने की अनुमति नहीं है। न्यायमूर्ति श्री टेकचंद का अभिमत था कि जाट शूद्र होते हैं और जो नियम त्रैवर्णीय पर लागू होता है, वह शूद्रों पर लागू नहीं होता और शास्त्रों के अनुसार अस्पृश्य लोगों को शूद्र माना जाता है। यह शूद्रों के बीच विवाह हुआ। अतः यह वैध है।