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सरदार बी.एस. मान : एक अछूत और शूद्र के बीच अंतर है।
डॉ. अम्बेडकर : लेकिन मेरे माननीय मित्र, यह न्यायालय का निर्णय है। न्यायालयों ने दोनों को शूद्र माना है और आप अच्छी तरह जानते हैं कि दोनों में अन्तर है।
केवल एक मुद्दा है जिस पर मेरे माननीय मित्र निर्भर रह सकते हैं कि सिख समाज उदारमना है और उसमें जाति प्रथा नहीं हैं तो इस आधार पर उन्हें इसका स्वागत करना चाहिए क्योंकि हमने जाति भेद को समाप्त कर दिया है अतः सिख समुदाय में जो कुछ हो रहा है, उससे इसका कोई विरोध नहीं है।
सरदार हुकम सिंह : हमारी शिकायत यह है कि आप हमें जहां तक लाना चाहते हैं उससे हम कहीं आगे प्रगति कर चुके हैं। मेहरबानी करके हमें पीछे मत लाइये।
डॉ. अम्बेडकर : प्रगति के बारे में अलग-अलग लोगों के मानदंड भी अलग-अलग हैं और इस बारे में मेरे भी अलग मानदण्ड हैं। तरक्की का मतलब यह भी हो सकता है कि कोई कानून नहीं-अराजकता - ऐसा भी हो सकता है। मेरा विचार है कि विभिन्न वक्ताओं द्वारा अपने संशोधनों के बारे में उठाए गए सभी मुद्दों का जवाब मैंने दे दिया है।
पंडित ठाकुर दास भार्गव : इस प्रस्ताव को स्वीकार करके कि विवाह-विच्छेद के मामलों का निर्णय जाति पंचायतों द्वारा किया जाना चाहिए, क्या आप जाति प्रथा को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं?
डॉ. अम्बेडकर : अभी हम उसके बारे में बात क्यों करें जब हम वहां पहुंचे ही नहीं हैं। इस समय मैंने सभी बातों का जवाब दे दिया है और कारण भी बताए हैं कि क्यों माननीय सदस्यों द्वारा प्रस्तावित संशोधनों में से किसी भी संशोधनों को स्वीकार करना संभव नहीं है। केवल एक संशोधन, जिसे मैं स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ वह है डॉ. बक्शी टेकचंद द्वारा प्रस्तुत संशोधन जिसमें इन्होंने ”सदस्यों“ शब्द के स्थान पर “अनुयायियों“ शब्द रखने का प्रस्ताव किया गया है।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : इस बहस में डॉ. अम्बेडकर के भाषण में हुई एक गलती को मैं सुधारने की इजाजत चाहता हूँ। (व्यवधान)
उपाध्यक्ष महोदय : यदि वे कोई गलती करते है तो उसे सुधारने का दायित्व भी उन्ही का है। माननीय सदस्य इसे मुझे बताएं। उस पर बात करने की कोई जरूरत नहीं है। अपने भाषण में जो कुछ कहा है, उस पर आपत्ति की जा सकती है लेकिन भाषणों में सुधार करते रहना हमारा काम नहीं है।