हिंदू कोड-जारी - Page 445

430 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

एक माननीय सदस्य : आपके संशोधनों को अस्वीकार किया जा रहा है।

श्री जे. आर. कपूर : मुझे क्षमा करें, परंतु यहां कुछ बातचीत चल रही है।

उपाध्यक्ष महोदय : माननीय सदस्य स्वयं कुछ कहते हैं और अन्य सदस्यों के साथ झगड़ा करते है।

श्री. जे. आर. कपूर : महोदय, मैं इसे वापस लेने की अनुमति चाहता हूँ।

अनुमति द्वारा संशोधन वापस लिया गया।

उपाध्यक्ष महोदय : श्री गोकुल भाई भट्ट द्वारा प्रस्तावित संशोधन सं. 116 के संबंध में क्या विचार है?

श्री भट्ट : मैं अपना संशोधन वापस लेने की अनुमति चाहता हूँ। अब यह आवश्यक नहीं है।

अनुमति द्वारा संशोधन वापस लिया गया।

उपाध्यक्ष महोदय : अब प्रश्न इस प्रकार है :

खंड 2 के उप-खंड (4) का लोप किया जाए।

प्रस्ताव अस्वीकार किया गया।

उपाध्यक्ष महोदय : संशोधन सं. 284 को समान होने के कारण हटाया जाता है। अगला संशोधन श्री नजीरुद्दीन अहमद द्वारा प्रस्तावित संशोधन सं. 118 है, कि

खंड 2 के उप-खंड (4) के बाद एक नया उप-खंड जोड़ा जाए अर्थात् : ‘‘(5) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी यह कोड किसी भी राज्य में केवल ऐसे क्षेत्रों अथवा ऐसे व्यक्तियों अथवा व्यक्तियों के वर्गां पर लागू होगा........ आदि”। इसे खंड 1 के लिए स्थगित रखा गया है। संशोधन सं. 118 और 285 एक समान हैं और उन्हें स्थगित रखा जाता है। मैं माननीय सदस्य को सुझाव देना चाहता हूँ कि यदि वे खंड 1 के संबंध में इन पर विचार-विमर्श चाहते हैं तो वे एक अलग संशोधन प्रस्तुत कर सकते हैं।

श्री नजीरुद्दीन अहमद : खंड 1 के संदर्भ के अनुरूप मैं अलग से एक संशोधन प्रस्तुत करूंगा।

उपाध्यक्ष महोदय : प्रश्न इस प्रकार है :

खंड 2 के उप-खंड (1) के भाग (घ) के स्थान पर निम्नलिखित को रखा जाएगा :