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इस समय पुनः क्रमांकन संशोधनों को छोड़ देना चाहिए। इन मौखिक अनियमिततओं के समाधान के लिए मेरे पास कई संशोधन हैं, परन्तु मैं उन्हें प्रस्तुत नहीं करना चाहता, क्योंकि मैं इसे पूरी तरह सचिव पर छोड़ देना चाहता हूँ।
अब मैं अपने संशोधनों पर आता हूँ जो आलिया संतान कानून की परिभाषा के अपवर्जन के लिए हैं और मेरे दूसरे संशोधन मरूमक्कट्टयम और नम्बूद्री कानून की परिभाषाओं के अपवर्जन से संबंधित हैं। इस संशोधन को प्रस्तुत करने का कारण इस प्रकार है; कि यह और दूसरे संशोधन इन विशेष कानूनों से संबंधित हैं, जिन्हे मैं हटा देना चाहता हूँ क्योंकि इस विधेयक की यह नीति है कि किसी भी मामले में कोई आरक्षण नहीं किया जाए और अपवाद नहीं रखा जाए। सिखों के मामले में हमने कोई अपवाद नहीं रखने का निर्णय लिया है। औरों के मामले में भी हमने कोड के दायरे से उन्हे बाहर रखने के लिए प्रावधान नहीं किया है। यह स्वीकार्य सिद्धांत होने के कारण........
उपाध्यक्ष महोदय : मैं समझता हूँ कि माननीय मंत्री कहना चाहते हैं कि वे इस अधिनियम के सभी प्रावधानों को इन दोनों वर्गों पर भी लागू करने का प्रस्ताव करते हैं।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : इसका तात्पर्य यह है कि इस विधेयक में विवाह विच्छेद के बारे में निर्धारित कानून उन हिंदुओं पर भी लागू होंगे जो अभी आलिया संतान, मरूमक्कट्टयम और नम्बूद्री कानून द्वारा नियंत्रित हैं।
उपाध्यक्ष महोदय : इसलिए अब कोई आपत्ति नहीं हैं।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : आपत्ति यह है कि जहां तक विवाह और विवाह -विच्छेद का संबंध है, सामान्य प्रावधान यदि सभी हिंदुओं पर लागू किए जाने हैं तो परिभाषा अनावश्यक है। यह तो गुमराह करने वाली बात है।
उपाध्यक्ष महोदय : हमने यह स्वीकार कर लिया है। जैसा कि सिखों के मामले में किया गया था, हमने अन्य लोगों को भी शामिल किया। अलग परिभाषा की अब कोई जरूरत नहीं है। आलिया संतान और मरूमक्कट्टयम कानून को अपवाद माना माना गया है। उन्हें विधेयक में यथा परिकल्पित विवाह और विवाह-विच्छेद के प्रचालन के दायरे से बाहर रखा गया है।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : मैं नहीं समझता कि उन्हे बाहर रखा जाना चहिए।
उपाध्यक्ष महोदय : माननीय विधि मंत्री जी ठीक यही करने की कोशिश कर रहे हैं।