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वास्तविक स्थिति का अहसास नहीं है। कुछ वर्गों अथवा समूहों को बाहर रखने के दो तरीके हैं - पहला पूरे कोड में उन्हे वास्तव में नजरअंदाज करके और दूसरा उनका संदर्भ देकर और उन्हें छूट प्रदान करके। यदि माननीय विधि मंत्री जी अब कोड की विषय-वस्तु में उनके लिए छूट का प्रावधान करना चाहते हैं, तो उनका उल्लेख करना आवश्यक है।
उपाध्यक्ष महोदय : यह बिल्कुल उल्टा हो गया है। उन्होंने इनके पक्ष में पहले ही छूट दे रखी है और विधेयक से बाहर रखने का प्रावधान किया है।
श्री राजगोपालाचारी : मैंने भी यही कहा है।
उपाध्यक्ष महोदय : वे चाहते यह हैं कि उन्हें शामिल किया जाए।
श्री राजगोपालाचारी : मेरा ख्याल है कि जिन माननीय सदस्य ने यह संशोधन प्रस्तुत किया है, उनका विचार है कि हमने यह पूरा कोड इन लोगों पर यथारूप लागू कर दिया है इसलिए, चूँकि आपने हिंदुओं को परिभाषित किया है, तो आप इन लोगों को परिभाषित क्यों करें। इसका उत्तर यह है कि हम इस कोड के प्रावधानों को यथारूप उन पर लागू करना नहीं चाहते, लेकिन छूट देना चाहते हैं और इसलिए यह परिभाषित करना जरूरी है कि वे लोग हैं कौन।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : इतनी बारीक बातें मैं पसंद नहीं करता हूँ। यदि यह कोड लागू किया जाना है तो इसे सीधे उन पर लागू किया जाना चाहिए बजाए इसके कि उन्हें कोई छूट दी जाए।
श्री राजगोपालाचारी : मान लीजिए कि हमने इसे उन पर लागू कर दिया; तो “उन्हें“ यहां परिभाषित किया जाना चाहिए। यही यहां किया जा रहा है।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : इसे सब पर लागू किया जाना चाहिए; वे हिंदुओं की परिभाषा में पहले से ही शामिल है।
श्री राजगोपालाचारी : इन लोगों के लिए अपवादात्मक प्रावधान है।
उपाध्यक्ष महोदय : पहले मुझे इसे समझने दीजिए; इसे समझे बिना मैं इसे सदन के सामने नहीं रख सकता। विधेयक का जो स्वरूप अभी है उसके अनुसार खंड 51 में कहा गया है कि :
”(1) इस भाग में निहित कोई भी बात सांस्कारिक विवाह का समापन करने हेतु, मद्रास मरूमक्कट्यम अधिनियम, 1932 द्वारा प्रदत्त किसी अधिकार को प्रभावित नहीं करेगी, चाहे विवाह इस कोड के प्रवृŸा होने से पूर्व अथवा पश्चात् किया गया हो।“