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पंडित ठाकुर दास भार्गव : मैंने अपने संशोधन पर अभी बात भी नहीं की है और मेरे माननीय मित्र पहले ही उसका विरोध करने लगे हैं।
उपाध्यक्ष महोदय : जी नही, प्रस्तावक का तात्पर्य केवल इतना है कि एकरूपता पूरे भारत के लिए एक कठिन मामला है प्रस्तावित संशोधन इस प्रकार है :
भाग ( i ) में “और एकरूपता” शब्दों का लोप किया जाएगा।”
पंडित ठाकुर दास भार्गव : आपकी अनुमति से मैं अपना दूसरा संशोधन भी प्रस्तुत करता हूँ - खंड 3 के भाग ( i ) में,
(क) चौथी पंक्ति में आने वाले ”समूह अथवा परिवार“ शब्दों के बाद निम्नलिखित को जोड़ा जाएगा :
“अथवा कोई नियम, जो निश्चित रूप से अनुचित नहीं है और किसी भी स्थानीय क्षेत्र जनजाति, सम्प्रदाय, समूह अथवा परिवार पर न्यायिक दृष्टि से वैध और बाध्यकारी माना गया है“; और
(ख) पहले परंतुक का लोप किया जाएगा।
यदि आप मुझे अनुमति दें तो इन संशोधनों को प्रस्तुत करने के बारे में मैं अपने तर्क प्रस्तुत करूंगा।
उपाध्यक्ष महोदय : अभी नहीं, मैं फिर से माननीय सदस्य पर आता हूँ। प्रस्तावित संशोधन इस प्रकार है :
खंड 3 के भाग ( i ) में,
(क) चौथी पंक्ति में आने वाले ”समूह अथवा परिवार“ शब्दों के बाद निम्नलिखित को जोड़ा जाएगा :
“अथवा कोई नियम, जो निश्चित रूप से अनुचित नहीं है और किसी भी स्थानीय क्षेत्र जनजाति, सम्प्रदाय, समूह अथवा परिवार पर न्यायिक दृष्टि से वैध और बाध्यकारी माना गया है“; और
(ख) पहले परंतुक का लोप किया जाएगा।
श्री झुनझुनवाला (बिहार)ः मैं अपना संशोधन सं. 413 को कुछ संशोधित रूप में जहां ”जाति“ शब्द आया है उसके स्थान पर “वर्ण” शब्द प्रयोग करते हुए प्रस्तुत करना चाहता हूँ।