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श्री बनारसी प्रसाद झुनझुनवाला द्वारा प्रस्तुत संशोधन में, जो पूरक सूची के संख्या-18 में छपा हैं, प्रस्तुत खंड-2 के परन्तुक में, शब्द जो, ‘‘जब तक कि ऐसा व्यक्ति’’ से प्रारम्भ होते हैं के लिए अंत में, के स्थान पर ‘‘जब तक कि ऐसा व्यक्ति, वयस्क होने की आयु के बाद, लिखित में यह घोषित न करे कि वह, जैसी भी परिस्थिति होगी, इस संहिता द्वारा शासित होगा/होगी, और ऐसी घोषणा को केन्द्रीय सरकार द्वारा इस उद्देश्य से बनाए गए नियमों के अनुसार पंजीकरण नहीं करवाता/करवाती।’’
श्री झुनझुनवाला का संशोधन, जिसमें मैंने आगे संशोधन किया है निम्न प्रकार होगा :-
‘‘2. संहिता का प्रयोग : यह संहिता या उसका कोई भाग या भागों का हिन्दुस्तान यानी भारत के सभी नागरिकों पर लागू होगा...’’ और उसके बाद यह केवल उन्हीं व्यक्तियों, जो लिखित में यह घोषणा करेंगे आदि आदि’’; मुझे उसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है।
महोदय, मैं अपनी पूरी जिम्मेदारी से यह संशोधन प्रस्तुत करता हूँ और आशा करता हूँ कि मुझे गलत नहीं समझा जाएगा। जैसा कि मुझे आशा है पहले दो वक्ता को गलत नहीं समझा गया, मेरा यह संशोधन और दो संशोधन जो मेरे मित्र श्री सरवटे और श्री इन्द्र विद्यावाचस्पति द्वारा पहले ही प्रस्तुत किए जा चुके हैं। उन्हीं के अनुसार हैं। मैंने उनके संशोधन में सुधार किया है। सबसे पहले मैं इसे प्रस्तुत करना चाहूँगा, मैं विशेष रूप से इस विचार से बहुत प्रभावित हुआ कि इस हिंदू संहिता को इस सदन में आसान राह मिलनी चाहिए। यह मेरा पहला अनुचिन्तन है। मेरे दूसरे अनुचिन्तन से पूरे देश को समुदाय के विभिन्न हिस्सों को व राष्ट्र के विभिन्न हिस्सों को यह सहज रूप में मान्य होना चाहिए। मेरा तीसरा अनुचिन्तन है कि हमें यह नहीं कहा जाना चाहिए कि इस संसद में, इस देश में जहां हमारा धर्मनिरपेक्ष राज्य है; जहाँ हमने संविधान, जिसका आधार धर्मनिरपेक्ष राज्य है, बड़ी मेहनत से बनाया है। हम अब विधि निर्माण इस प्रकार करने का प्रयत्न कर रहे हैं जिसमें साम्प्रदायिकता की गंध आती है, इससे स्पष्ट है कि हम केवल समुदाय के एक हिस्से के लिए विधि निर्माण करने का प्रयत्न कर रहे हैं, दूसरों के लिए नहीं, हम एक धर्म को मानने वालों के लिए विधि निर्माण कर रहे हैं और जो अन्य दूसरे धर्म को मानते हैं उनके हितों को अनदेखा कर रहे हैं या ऐसा ही, हम कुछ ऐसा करने का प्रयत्न कर रहे हैं कि समुदाय के एक भाग के अधिकारों और धार्मिक रिवाजों को छीन लें और डरते हैं कि समुदाय के दूसरे लोग जो दूसरा धर्म मानते हैं। उनके अधिकार और रियायत न छिन जाए। इसलिए मैं सोचता हूँ अगर मेरा संशोधन मान लिया गया तो उसके बहुत से लाभ होंगे और पक्के तौर पर कोई हानि तो होगी ही नहीं।