32 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सुबह मेरे मित्र श्री नजीरुद्दीन अहमद ने व्यवस्था का जो मुद्दा उठाया मैं उसे सुनकर बहुत प्रसन्न हूँ, यह नहीं कि मैं व्यवस्था के लिए उठाए गए उस मुद्दे से पूर्णरूप से सहमत हूँ परन्तु उसके पीछे जो विचार और कारण है और उन मुद्दों को उठाने के साथ उनकी मान्यताओं का जो मूल्य जुड़ा है। उन्होंने प्रश्न उठाया था कि संविधान भेदभावपूर्ण विधि निर्माण की आज्ञा नहीं देता। उन्होंने अनुच्छेद 25 का हवाला भी दिया था। मैं अनुभव करता हूँ मेरे मस्तिष्क में भी ऐसा ही विचार आ रहा था, अगर हिंदू संहिता के प्रावधान लाभदायक और उपयोगी हैं तो राष्ट्र के सभी वर्गों पर ही क्यों नहीं लागू होना चाहिए? यही मेरे मन में था, उन्होंने जो एक ऐसा कानून बनाने का जो राष्ट्र के सभी समूहों पर, हिंदू, मुसलमान, पारसी, ईसाई सभी पर लागू होगा, जो मुद्दा उठाया मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि वे बहुत खुश होंगे। वास्तव में संविधान का एक और अनुच्छेद भी है : अनुच्छेद 44 जिसका हवाला मेरे मित्र श्री सरवटे ने दिया था; कि राज्य को एक समान नागरिक संहिता बनानी चाहिए। यह सही है कि इस अनुच्छेद को मौलिक अधिकारों के अध्याय में नहीं जोड़ा गया, लेकिन यह निर्देशों का सिद्धान्त में दिया गया है। संविधान में विशेष रूप से निर्देश दिया गया है कि हमें सम्पूर्ण देश के लिए समान सिविल संहिता बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।
ठीक है, यह पहला अवसर है जब हम नागरिक संहिता बनाने की कोशिश कर रहे हैं और इस पहले प्रयत्न में क्या हमारे लिए यह सही होगा, हम संविधान के इस महत्वपूर्ण अनुच्छेद की उपेक्षा कर दें। हमें शुरूआत, संविधान में दिए गए विशेष निर्देश के विरुद्ध नहीं करनी चाहिए। जब हम संवैधानिक सभा के रूप में बैठे हुए थेः हम सब इसमें थे, हममें से अधिकतर जो और बहुत से दूसरे विख्यात व्यक्ति जो यहाँ नहीं हैं, भी वहाँ थे, बहुत मुस्लिम सदस्य भी उसमें थे और उसमें पारसी भी थे, और वहाँ ईसाई भी थे और वहां सभी विश्वासों को मानने वाले व्यक्ति थे। वे सभी, जहाँ तक मुझे याद है एक रूप में संविधान के इन अनुच्छेदों से सहमत थे, मेरा तात्पर्य अनुच्छेद 15, 25 और 44 से है। जब हर एक मत के मानने वाले व्यक्ति वहाँ थे, गम्भीरता से, सहजता से और शान्ति से विचार कर रहे थे कि इस देश में किस प्रकार का कानून होना चाहिए, उन सभी ने एक साथ निर्णय किया कि हमारा समान कानून होना चाहिए, जिससे कि संविधान के अनुच्छेद 15 और 25 और अनुच्छेद 44 के भी अनुरूप हो। तब से अब तक क्या हुआ है, अपने संविधान के उन अनुच्छेदों के अनुसार न करने पर हम विवश हैं? वास्तव में तब से अब तक कुछ भी नहीं हुआ जो हमें उन प्रावधानों के विरुद्ध करने पर विवश करें। दूसरी तरफ, जो लोग हिंदुत्व के अलावा दूसरे धर्मों को मानते हैं वे भी समान नागरिक संहिता के लिए आतुर हैं। श्री नजीरुद्दीन अहमद, मुसलमानों के प्रतिनिधि हैं। वह अपने आप कहते हैं कि केवल राष्ट्र के एक भाग पर लागू होने वाले कानून