446 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उपाध्यक्ष महोदय : यह कब भेजी गई थी?
श्री भट्ट : आज सुबह। 10.00 बजे पूर्वाह्न
उपाध्यक्ष महोदय : मैं यह जरूर महसूस करता हूँ कि अंतिम क्षणों में कुछेक संशोधनों को सरकार की ओर से या दूसरी ओर से प्रस्तुत करने की अनुमति देनी पड़ेगी। परन्तु मैं माननीय सदस्यों को सुझाव दूँगा कि कम से कम विधि मंत्री जी को ऐसे संशोधनों के बारे में पूर्व सूचना दे दी जाए और एक प्रति मुझे भी भिजवाई जाए। जहां तक नये संशोधनों का प्रश्न है, मैं इस नियम पर सख्ती से अमल करूंगा। सदन के सभी वर्गों को इनसे सहमत होना चाहिए।
श्री भट्ट : इसके भाग ( i ) के लिए मैंने प्रस्ताव किया है। मैं अनुरोध करता हूँ कि :
खंड 3 के भाग ( i ) के स्थान पर निम्नलिखित को रखा जाएगा :
“(1) ”प्रथा” और ”रूढि़“ किसी ऐसे नियम की ओर संकेत करते हैं, जिसका अनुपालन लम्बे समय से किया जा रहा है और जिसने किसी भी स्थानीय क्षेत्र, जाति, उपजाति, जनजाति, सम्प्रदाय, समूह अथवा परिवार में हिंदुओं के बीच कानून का रूप ले लिया है :
बशर्ते कि नियम निश्चित है और अनुचित नहीं है; और
बशर्तें यह भी कि केवल एक परिवार पर लागू नियम के मामले में परिवार द्वारा इसे त्याग नहीं दिया गया है।”
उपाध्यक्ष महोदय : इस और उस के बीच क्या अन्तर है?
श्री भट्ट : उसे मैंने इसमें से निकाल दिया है। इसके एक भाग को बरकरार रखा है। इसीलिए मैंने इस संशोधन को मसौदा इस तरह से तैयार किया है।
उपाध्यक्ष महोदय : प्रस्तावित संशोधन इस प्रकार है :
खंड 3 के भाग ( i ) के स्थान पर निम्नलिखित को रखा जाएगा :
“(1) ”प्रथा” और ”रूढि़“ किसी ऐसे नियम की ओर संकेत करते हैं, जिसका अनुपालन लम्बे समय से किया जा रहा है और जिसने किसी भी स्थानीय क्षेत्र, जाति, उपजाति, जनजाति, सम्प्रदाय, समूह अथवा परिवार में हिंदुओं के बीच कानून का रूप ले लिया है :