हिंदू कोड-जारी - Page 462

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बशर्ते कि नियम निश्चित है और अनुचित नहीं है; और

बशर्तें यह भी कि केवल एक परिवार पर लागू नियम के मामले में परिवार द्वारा इसे त्याग नहीं दिया गया है।”

श्री श्यामनंदन सहाय : श्री आर. के. चौधरी द्वारा प्रस्तावित संशोधन भाग 2 से संबंधित है, न कि एक से।

डॉ. अम्बेडकर : यह उसी खंड से संबंधित है।

पंडित ठाकुर दास भार्गव : अपने संशोधन सं. 444 और 446 के संबंध में मैं प्रथा के बारे में कुछ सामान्य बातें बताना चाहूँगा। वर्तमान कोड का मुख्य आधार यह है कि ऐसे रीति-रिवाज और कानून जो अधिनियमित किए जाने वाले इस कोड के सिद्धांतों के विरुद्ध हैं, हमेशा के लिए समाप्त कर दिए जाएंगे। मैं समझता हूँ कि यह कोड तैयार करने का मूल सिद्धांत यह है कि देश के विभिन्न भागों के विविध प्रकार के रीति-रिवाजों को इस अधिनियम के प्रावधानों के माध्यम से इस प्रकार एकीकृत किया जाएगा कि संबंधित सम्प्रदायों के लिए पूरे भारत में एक कानून लागू होगा। मैंने इस आधार को एक अच्छे आधार के रूप में स्वीकार किया है और मैं यह कोड तैयार करने के पक्ष में हूँ क्योंकि तब हमारे कानून निश्चित हो जाएंगे और पूरे भारत के हिंदुओं पर लागू होंगे।

इस कोड के माध्यम से एकीकृत किए जाने वाले रीति-रिवाजों के अलावा कई रीति-रिवाजों और कानून ऐसे भी हैं जिनमें हम बदलाव चाहते हैं। संहिताबद्ध करने का यह एक ऐसा प्रयास मात्र नहीं है। निश्चित रूप से यह एक ऐसा कोड है, जिसमें हम अपने सभी अप्रिय रिवाजों और कानूनों में संशोधन करना चाहते हैं और इसीलिए इस लिहाज से यह एक सुधारवादी विधेयक भी है। मैं इस विधेयक के प्रावधानों के पक्ष में हूँ, क्योंकि मेरे विचार से हम वर्तमान प्रथाओं की तुलना में उन्नति कर रहे हैं और हिंदुओं में अभी जो कानून और रीति-रिवाज प्रचलित हैं उनमें इसके माध्यम से काफी हद तक सुधार किया जा रहा प्रतीत होता है।

परन्तु जब मैं देखता हूँ कि डॉ. अम्बेडकर इस विधेयक के इस या उस रिवाज से सहमत हैं तो मुझे महसूस होता है कि जिन अनिवार्य सिद्धांतों पर यह कोड आधारित है, अवसरवाद के लिए उनकी बलि दी जा रही है। मैं जानता हूँ कि वे भारी पशोपेश में हैं और उनके साथ मुझे और कुछ नहीं बल्कि सहानुभूति है। मैं जानता हूँ कि व्यक्तिगत तौर पर वे इन रिवाजों को स्वीकार नहीं करेंंगे। व्यक्तिगत तौर पर मैं भी वैसा ही करूंगा और जहां तक उनके दृष्टिकोण का संबंध है उनके और मेरे बीच........