हिंदू कोड-जारी - Page 464

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उपाध्यक्ष महोदय : प्रथा को किस प्रकार मान्यता दी जानी है। यदि माननीय सदस्य प्रतिबंध लगाना चाहते हैं तो यह मौजूदा रीति-रिवाजों की विस्तृत चर्चा किए बिना भी निःसंदेह दायरे के भीतर है।

पंडित ठाकुर दास भार्गव : मैं इस समय विस्तृत चर्चा की बात नहीं कर रहा हूँ। जब मौका सामने आएगा तब हम देखेंगे कि क्या उन मामलों से संबंधित प्रथा को जारी रखा जाना चाहिए। यहां मैं केवल सामान्य बात कर रहा हूँ और डॉ. अम्बेडकर से निवेदन कर रहा हूँ कि........

उपाध्यक्ष महोदय : यह सामान्य टिप्पणी पहले और दूसरे चरण में आ सकती है कि कोई रीति-रिवाज नहीं होंगे, इत्यादि।

पंडित ठाकुर दास भार्गव : मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि कोई रिवाज नहीं माना जाना चाहिए। मैं केवल इतना कह रहा हूँ कि उन्हें बहुत ज्यादा उदार नहीं होना चाहिए और अनेक प्रकार के रिवाजों की अनुमति नहीं देनी चाहिए जो इस बिल के प्रभाव को समाप्त कर दें। यदि हरेक मामले से जुडे़ रिवाज को आप बनाए रखना चाहते हैं तो इसका मतलब होगा कि इस कोड के होने का कोई प्रयोजन ही नहीं है।

उपाध्यक्ष महोदय : फिर हम विस्तार में जा रहे हैं। यह कहना एक बात है कि इसके बाद कोई प्रथा नहीं होगी और केवल कानून होगा। लेकिन यह कहना दूसरी बात है कि कुछ प्रथाओं को हमें जारी रखना है। उस मामले में जब हम विस्तार से चर्चा करेंगे कि क्या जारी रखा जाना है और किन प्रथाओं को जारी नहीं रखना है।

पंडित ठाकुर दास भार्गव : इस परिभाषा द्वारा मैं प्रथाओं के दायरे को सीमित कर रहा हूँ। मान लीजिए कि केवल उन्ही प्रथाओं को जारी रखा जाना है जो कानूनी दृष्टि में मान्य हैं तो इससे प्रथाओं का दायरा निश्चित रूप से सीमित होगा। अन्यथा यदि हम प्रथा को अपरिभाषित छोड़ दें तो व्यक्ति किसी कठिनाई का सामना करे और चाहे जितने प्रमाण प्रस्तुत करे; प्रथा को केवल उदाहरणों से ही नहीं बल्कि जनमत से और धार्मिक ग्रन्थों के संदर्भ से ही सिद्ध किया जा सकता है। इसलिए मैं चाहता हूँ कि जहां तक प्रथा का संबंध है, इसका दायरा सीमित रखा जाए। ऐसा नहीं है कि मैंने केवल एक मामला उठाया है और डॉ. अम्बेडकर के विचारार्थ प्रस्तुत किया है। मैंने तो इससे भी आगे जाकर प्रथाओं के उनके उदारीकरण की विसंगति को दर्शाने के लिए मैंने कुछेक संशोधन उन्हे दिखाए और इस बात पर जोर दिया है कि उन्हें सावधानीपूर्वक आगे बढ़ना चाहिए। इसीलिए मेरे संशोधन सं. 446 में