हिंदू कोड-जारी - Page 465

450 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कहा गया है कि :

”अथवा कोई भी नियम, जो अनुचित नहीं है और किसी भी स्थानीय क्षेत्र, जनजाति, सम्प्रदाय, समूह अथवा परिवार में कानूनी दृष्टि से मान्य और बाध्यकारी है।“

मैं यह समझ सकता हूँ कि कुछेक रीति-रिवाज हैं जो फल-फूल रहे हैं और कुछेक स्थिर बना दिए गए हैं। जहां तक फलते-फूलते रिवाजों का प्रश्न है, हम चाहते हैं कि वे आगे न बढ़ें क्योंकि किसी सांविधिक नियम को प्रभावी रखने का यही एक तरीका है। जहां तक ऐसी प्रथाओं का प्रश्न है, जिन्हें कानूनी मान्यता प्राप्त नहीं है, मेरा अपना मत यह है कि हमें उन्हें इसके दायरे के भीतर नहीं लाना चाहिए। या तो हम यह स्वीकार कर लें कि समाज द्वारा रीति-रिवाज को एकमात्र आचरण नियम के रूप में स्वीकार कर लिया जाना चाहिए और हिंदू समाज में कोई दूसरा नियम नहीं होना चाहिए जैसा कि पहले होता था - उस मामले में भी हम ऐसी स्थिति में पहुंच जाएंगे जब प्रथा इतनी रूढ़ हो जाएगी कि जो हम चाहते हैं वह हम हासिल कर लेंगे - या दूसरे मामले में जब हम व्यावहारिक नियम लागू करना चाहते हैं, जब हम कानूनी तौर पर यह निर्धारित करना चाहते हैं कि नियम अमुक प्रकार से होगा। जो कुछ भी हो, हमारे लिए यही बेहतर होगा कि हम उन्हीं प्रथाओं को मान्यता दें जो कानूनी दृष्टि से भी मान्य हैं। दी गई परिभाषा में यह प्रतीत होता है कि किसी भी प्रथा की कानूनी मान्यता का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। इसके विपरीत पहले परंतुक के शब्द इस प्रकार हैं :

“कि नियम निश्चित है और अनुचित अथवा सार्वजनिक नीति के विरुद्ध नहीं है”।

मैं ”सार्वजनिक नीति के विरुद्ध नहीं है“ शब्दों का विरोधी हूँ। मैं नहीं जानता कि ”सार्वजनिक नीति“ है क्या। जहां तक एक विवाह प्रथा का संबंध है, मैं समझता हूँ कि सार्वजनिक नीति यह है कि सरकार का विचार है कि एक विवाह प्रथा हिंदुओं के लिए अच्छी है परन्तु शेष समुदाय पर यह लागू नहीं होती; जहां तक मेरे मुसलमान मित्रों का संबंध है उनमें से अनेक लोगों को मैं जानता हूँ जो बहुविवाह प्रथा को पसंद नहीं करते; फिर भी सरकार अनिर्णय की स्थिति में है और उसने इस संदिग्ध तर्क का आश्रय लिया है कि उनके साथ विचार-विमर्श नहीं किया गया। यदि कोई बात सार्वजनिक नीति के विरुद्ध है तो यह सबके लिए लागू है। मैं पंजाब में प्रचलित एक प्रथा के बारे में जानता हूँ जहां खरवा विवाह की अनुमति है। इसे पूरी तरह द्विपत्नी विवाह तो नहीं कहा जा सकता, परन्तु यह द्विपत्नी विवाह का ही एक रूप है क्योंकि किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसकी विधवा का देवर अर्थात्