452 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
माननीय सदस्य इतनी मेहनत कर रहे हैं? कुछेक प्रथाएं हैं, जिन्हें मान्यता प्रदान की जानी चाहिए, कुछेक प्रथाएं हैं जो अनुचित हैं और इसलिए सार्वजनिक नीति के विरुद्ध हैं। सार्वजनिक नीति एक ऐसा मामला है जिसका निर्णय निर्णयकर्ता के विवेक से किया जा सकता है। उन मामलों के संबंध में हम कह सकते है कि उन्हे न्यायालय के निर्णय पर क्यों छोड़ा जाए; वे प्रथाएं पूरी तरह घृणित हैं। परन्तु जहां तक अन्य प्रथाओं का संबंध है, ऐसा क्यों कहें कि उन्हें न्यायालय द्वारा ही मान्यता दी जानी चाहिए? मेरा ख्याल है कि सभी बातों के लिए कानून बनाना असंभव है।
डॉ. अम्बेडकर : इस मुद्दे को स्पष्ट करने के लिए आप शायद मुझे एक-दो मिनट के लिए हस्तक्षेप करने की अनुमति प्रदान करेंगे।
पंडित ठाकुर दास भार्गव : महोदय, मेरा विचार भी वही है जो आपने व्यक्त किया
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है, परन्तु मैं इसे अलग तरीके से व्यक्त कर रहा हूँ। मैं उन प्रथाओं से छेड़छाड़ नहीं करना चाहता जो फल-फूल रही हैं, जो अच्छी प्रथाएं हैं, परन्तु मुझे डर इस बात का है कि कोई भी न्यायालय स्वयं यह कह सकता है कि यह सार्वजनिक नीति के विरुद्ध है। यहां सभी प्रथाओं की बात नहीं की गई है क्योंकि देश भर की प्रथाओं पर हमारे पास विस्तार से बात करने का समय और ऊर्जा नहीं है। चूकि हम यह नहीं कह सकते हैं कि कौन-कौन सी प्रथाएं बची रहेंगी, इसलिए हमें कहना चाहिए कि जिस प्रथा को मान्यता दी जानी है उसकी न्यायिक दृष्टि से मान्यता होनी चाहिए कि वह सार्वजनिक नीति के विरुद्ध नहीं है।
डॉ. अम्बेडकर : मेरे मित्र पंडित भार्गव ने जो प्रश्न उठाया है वह निःसंदेह बहुत महत्वपूर्ण है और जहां तक मेरी जानकारी है, जो वैचारिक स्थिति मेरी है और जो वैचारिक स्थिति उनकी है दोनों के बीच रत्ती भर भी अन्तर नहीं है। यदि मैं कहूँ तो बात केवल इतनी है कि उन्होंने अपना दिमाग एक गलत खण्ड पर लगाया है और इसीलिये वे भ्रम की स्थिति में हैं कि आखिर स्थिति है क्या? सदन के उन सदस्यों को, जो प्रथा बनाम कोड विषय में दिलचस्पी रखते है, उन्हें अपना दिमाग खंड 3 पर नहीं बल्कि खंड 4 पर लगाना चाहिए, जो प्रमुख खंड है और जो इस कोड और कानून के प्राधिकार के बजाए प्रथा के प्राधिकार के मामले से संबंधित है। और महोदय, आप उसमें एक बहुत ही स्पष्ट वक्तव्य पाएंगे कि जब तक किसी प्रथा की व्यावृŸा विशेष रूप से न की गई हो, इस कानून के विपरीत वह प्रथा लागू नहीं की जाएगी। अतः इस प्रश्न पर कि क्या किसी प्रथा विशेष की व्यावृŸा की गई है अथवा नहीं, तब विचार किया जाना चाहिए जब हम इस विधेयक के प्रत्येक खंड पर चर्चा करें, जिस पर सदस्यगण प्रश्न उठा सकते हैं कि क्या किसी खंड विशेष को उसी रूप में रखा जाना चाहिए जिस रूप में उसका मसौदा तैयार किया गया