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है अथवा उसे किसी प्रथा विशेष के अधीन रखा जाना चाहिए। यदि इस विधेयक के खंड विशेष में ”प्रथा द्वारा अन्यथा होने को छोड़कर“ अथवा “जब तक कोई प्रथा इसके विपरित न हो” नहीं कहा गया हो, ऐसी कोई प्रथा नहीं है, जिसे इस विधेयक में मान्यता देने को प्रस्ताव किया गया है। किसी भी प्रथा को इस कोड के उपबंधों से सामान्य रूप से ऊपर रखने का तनिक भी मन्तव्य नहीं है।
मैं जानता हूँ कि मेरे माननीय मित्र के ध्यान में कोई विशेष प्रश्न अथवा दृष्टांत है जब वे महसूस करते हैं कि मैं इस विशिष्ट विषय में कुछ नरमी बरत रहा हूँ, परन्तु मैं उन्हें कह सकता हूँ कि बहुत ही कम मामले ऐसे होते हैं जब मैं इस विषय में झुकना चाहता हूँ, बशर्ते जब कोई मुझ पर किसी प्रथा को इस कोड विशेष से किसी भी तरह से ऊपर रखने का दबाव डालता है, तो यह सिद्ध करने का दायित्व भी उसी का होगा कि वह प्रथा इस विधेयक विशेष के उपबंधों से कहीं अधिक प्रगतिशील है।
अब, मान लें कि जब हम विभिन्न विषयों पर चर्चा करते समय कोई अर्हताकारी वक्तव्य लागू कर देते हैं अर्थात् हम यह कहते हैं कि वह खंड किसी मौजूदा प्रथा के अघ्यधीन होगा या ऐसी ही कोई बात हम कहते हैं, तब भी प्रश्न यही रहता है कि - वह कौन-सा मानक है जिसके अनुरूप वह प्रथा होनी चाहिए, इससे पहले कि हम उसे ऊपर रखें? यही वह प्रश्न है जिस पर परिभाषा खंड में चर्चा की गई है, ताकि जब कभी किसी प्रथा की व्यावृŸा की जाती है, तब भी यह जानने के लिए रास्ता खुला है कि क्या जिस प्रथा को किसी खंड विशेष द्वारा इस विधेयक के उपबंध से अलग रखा गया है, वह परिभाषा के अनुरूप है, जो वह मानक निर्धारित करती है जिसे न्यायालय द्वारा स्वीकार किए जाने से पूर्व उस प्रथा को उस मानक के अनुरूप होना चाहिए। स्थिति यह है।
जहां तक खंड 3 के ( ii ) का प्रश्न है, इस खंड में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे हमारे देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों के न्यायिक निर्णयों से यथारूप नहीं लिया गया है, जिन्होंने इस बात पर विचार किया था कि वह कौन-सी प्रथा होगी जिसे वह अपनी संस्वीकृति देंगे और मेरा विचार है कि जिन प्रथाओं को न्यायालयों ने निर्धारित किया है उनके संघटकों को यथारूप एवं अक्षरशः खंड 3 के भाग ( ii ) में समाविष्ट किया गया है इसलिए मैं समझता हूँ कि परिभाषा के बारे में झगड़ा करने का कोई आधार नहीं है, क्योंकि परिभाषा का होना आवश्यक है जहां भी हम किसी प्रथा की व्यावृŸा करना चाहते हैं, हम महज किसी भी प्रथा को नहीं, बल्कि उसी प्रथा की व्यावृŸा करना चाहते हैं, जो उन मानकों के अनुरूप हैं जिन्हें उच्च न्यायालयों द्वारा निर्धारित किया गया है और माननीय सदस्यगण यह देखेंगे कि भाग