454 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
( ii ) में निर्धारित मानक वही मानक हैं जो देश के विभिन्न न्यायालयों द्वारा स्वीकृत तथा निर्धारित किए गए हैं।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : विदेशी न्यायालयों में भी ऐसा ही होता है।
डॉ. अम्बेडकर : हर जगह ऐसा ही होता है। मैंने अँग्रेजी कानून का स्टीफन्स डायजेस्ट भी पढ़ा है और मैंने देखा है कि शब्द विन्यास लगभग वैसा ही है जैसा हमने यहां किया है।
पंडित ठाकुर दास भार्गव : यह स्पष्टीकरण देने के लिए मैं अपने माननीय मित्र और विधि मंत्री जी का अत्यन्त आभारी हूँ।
श्री जे. आर. कपूर (उत्तर प्रदेश) : क्या माननीय सदस्य ने अपनी बात समाप्त नहीं की है?
उपाध्यक्ष महोदय : जी, नहीं। वे अपनी बात जारी रखेंगे। वे उठकर खड़े हुए हैं। संयोग से, न केवल संसद सदस्य बल्कि बाहर के लोग भी इस विधेयक की प्रगति पर नजर रखे हुए हैं और मेरी वैचारिक स्थिति के बारे में कुछ गलतफहमी है। इस आसंदी पर बैठने के बाद मैं रंग, जाति या पंथ का भेद नहीं करता। यही मेरी वास्तविक वैचारिक स्थिति है। अपने सर्वोत्तम विवेक के अनुसार मैंने अपने कर्त्तव्य का निर्वहन निष्पक्ष रूप से करने का प्रयास किया है। यदि कोई माननीय सदस्य सही या गलत महसूस करता है कि मैं उचित तरीके से कुछ कर नहीं रहा हूँ तो मैं इस बात का स्वागत करूंगा कि वे अलग से आकर मुझसे मिलें और कहें कि मुझे ऐसा या वैसा करना चाहिए।
मैं महसूस कर रहा हूँ कि इस सदन के माननीय सदस्यों का यह विचार है कि जब कोई माननीय सदस्य बोलने के लिए उठ खड़े होते हैं तो मैं उन्हे बैठ जाने के लिए कह सकता हूँं। मैं माननीय सदस्यों से अपील करता हूँ कि महत्वपूर्ण मामलों के संबंध में निःसंदेह पर्याप्त व्यापकता और समय दिया जाना चाहिए, परन्तु यदि वे उन्हीं बातों को दोहराते हैं जिन पर पहले कई बार चर्चा की जा चुकी है तो यह उचित नहीं है। इसको छोड़कर मैं समय की पाबंदी लगाने की स्थिति में नहीं हूँ। यदि माननीय विधि मंत्री जी मुझे यह बता सकते हों कि कानून के अन्तर्गत भाषणों की समय-सीमा पर कोई प्रतिबंध लगा सकता हूँ तो मैं इसका लाभ जरूर उठाऊंगा।
डॉ. अम्बेडकर : ऐसा नहीं किया जा सकता। लेकिन अपने आप पर आत्मत्याग अध्यादेश लागू करने पर हम सब सहमत हैं।
उपाध्यक्ष महोदय : मुझे यह जानकर बहुत खुशी है परन्तु इसका दायित्व अध्यक्ष