हिंदू कोड-जारी - Page 470

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पर नहीं डाला जाना चाहिए। वित्त विधेयक पर मैं गिलोटिन लगा सकता हूँ। इसकी शुरूआत हाल ही में की गई है। अब तक केवल बजट अनुदानों पर ही गिलोटिन लगाया जाता था लेकिन जहां तक वित्त विधेयकों का संबंध है, इसे हाल ही में लागू किया गया है। मैं एक समय-सीमा निर्धारित कर सकता हूँ और सभी संशोधन समाप्त हो जाएंगे जब तक उन्हें उस समय-सीमा से पहले प्रस्तुत और स्वीकार या अस्वीकार नहीं किया जाता। परन्तु जहां तक अन्य विधेयकों का प्रश्न है, किसी पूरे विधेयक के संबंध में भी मुझे कोई समय-सीमा निर्धारित करने का अधिकार नहीं है यह प्रतिबंध होने की वजह से मुझे शर्म महसूस होती है, यदि कोई माननीय सदस्य यह समझता है कि मैं बोलने के लिए बहुत ज्यादा समय दे रहा हूँ। यही मेरी स्थिति है और इस आसंदी पर कोई भी हो तो उसकी भी यही स्थिति होगी।

और अन्त में, यदि कोई माननीय सदस्य यह महसूस करता है कि किसी खंड विशेष पर पर्याप्त बहस की जा चुकी है तो वह कृपा करके मुझे बता सकता है। इसमें भी निःसंदेह विवेकाधिकार मेरा है। यदि मैं भी महसूस करता हूँ कि मामले पर व्यापक रूप से चर्चा की जा चुकी है या पर्याप्ततः बहस कर ली गई है तो मैं भी प्रस्ताव समाप्ति पर सहमत हो जाऊँगा। उस सीमा तक विवेकाधिकार मेरे पास है। जो माननीय सदस्य सुझाव देना चाहते हैं, वे कृपया इन बातों का ध्यान रखेंगे। मैं यह बात इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि बाहर ऐसी बात फैलाई जा रही है कि माननीय सदस्यों के सुझावों के बावजूद मैं उनके आड़े आ रहा हूँ और किसी प्रकार की रोक लगा रहा हूँ।

इसी संबंध में मैं सदन को सूचित करना चाहता हूँ कि इण्डियन न्यूज क्रॉनिकल के प्रबंध सम्पादक से मुझे एक पत्र प्राप्त हुआ है। सदन को याद होगा कि कल श्री अमोलख चन्द ने इस समाचार-पत्र में छपे एक कार्टून की ओर मेरा ध्यान आकृष्ट किया था, जिसमें कुछ सदस्य एक घड़ी की मिनट और घण्टे की सुइयों को पकड़े हुए हैं और घड़ी को चलने से रोके हुए हैं और उपाध्यक्ष ने घड़ी का पैण्डुलम कसकर पकड़ रखा है ताकि घड़ी न इधर चल सके न उधर। माननीय सदस्यों को ऊपर की ओर देखते हुए दिखाया गया है, न कि नीचे; और वे यह देख रहे हैं कि कौन वास्तव में घड़ी को रोके हुए है। इस कार्टून द्वारा इस प्रकार की छवि बनाई गई है। चूँकि इस मामले का उल्लेख मैंने कल किया था और व्यावहारिक तौर पर यह सदन का विशेषाधिकार है और मैं केवल इसका प्रवक्ता हूँ, अतः मैं यह पत्र पढ़ना चाहूँगा। यह पत्र श्री देशबंधु गुप्ता, प्रबंध सम्पादक ने लिखा है और इस प्रकार है :

प्रिय श्री अनंतशयनम आयंगर