हिंदू कोड-जारी - Page 474

459

पंडित ठाकुर दास भार्गव : इस सदन का सदस्य होने के नाते मेरी आकांक्षा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस नियम का पालन किया जाना चाहिए। मैं इस विधेयक की प्रगति में कोई रुकावट नहीं डालना चाहता। लेकिन जब मेरा मन बोलने को चाहता है और अध्यक्ष महोदय मुझे टोक कर अपनी पूरी बात कहने की अनुमति नहीं देते तब मैं बहुत आहत महसूस करता हूँ। सभी सदस्यों से आत्मसंयम रखने की अपेक्षा की जाती है। अब मैं अपने विषय पर आता हूँ।

अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने के लिए मैं डॉ. अम्बेडकर का अत्यन्त आभारी हूँ। मैं जानता हूँ कि प्रथा को अनेक न्यायिक निर्णयों में परिभाषित किया गया है। लेकिन मेरा मुद्दा यह नहीं है। मेरा सुझाव यह था कि किसी प्रथा की वैधता का स्वीकृत सिद्धांत यह होना चाहिए कि वह न्यायिक दृष्टि से मान्यता प्राप्त है। मेरा तथ्य यह है कि जब प्रथा सार्वजनिक नीति के विरुद्ध हो तो उसे न्यायिक दृष्टि से मान्यता प्राप्त होने पर भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि कोई प्रथा कानूनी दृष्टि से मान्यता प्राप्त है तो इसका तात्पर्य है कि न्यायालयों ने उस पर विचार-विमर्श किया है और न्यायपालिका के हाथों से उसे मान्यता प्रदान की गई है।

डॉ. अम्बेडकर : मैं एक क्षण के लिए हस्तक्षेप करना चाहता हूँ और कहना चाहता हूँ कि जब हम प्रत्येक खंड पर चर्चा करेंगे तब वह प्रश्न फिर उठेगा या उठाया जाएगा। मेरे माननीय मित्र ने सुझाव दिया है कि ”कोई भी प्रथा जो न्यायिक दृष्टि से मान्यता प्राप्त हो”। वे ऐसा कहने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। परन्तु, जैसा कि आपने ठीक ही कहा है कि यदि हम अपनी मान्यता को न्यायिक दृष्टि से मान्यता प्राप्त प्रथा तक ही सीमित रखते हैं, तो इससे कई कठिनाईयां पैदा होंगी। ऐसी कई अच्छी प्रथाएं हैं जो परिभाषा के सभी संघटकों को संतुष्ट करती हैं, फिर भी न्यायिक मान्यता के लिए न्यायालय तक नहीं आई हैं। मैं केवल कठिनाईयों का अनुमान लगा रहा हूँ।

श्री संथानम : ”न्यायिक दृष्टि से मान्यता ‘‘प्राप्त’’ शब्दों से तात्पर्य जिला न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय द्वारा मान्यता से हो सकता है। हम यह नहीं कह सकते कि न्यायिक दृष्टि से मान्यता प्राप्त से तात्पर्य उच्चतम न्यायालय द्वारा मान्यता प्राप्त होने से है।

पंडित ठाकुर दास भार्गव : इसे न्यायिक दृष्टि से मान्यता प्राप्त होना चाहिए और इसे निश्चित भी होना चाहिए। इसे अनुचित नहीं होना चाहिए, इसमें निरन्तरता होनी चाहिए और इसमें कानून की शक्ति होनी चाहिए। मैं केवल इतना ही चाहता हूँ कि