हिंदू कोड-जारी - Page 475

460 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

न्यायिक दृष्टि से मान्यता प्राप्त प्रथा को सार्वजनिक नीति के नाम पर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। अतः वैध प्रथा के इन सभी पहलुओं को स्वीकार किया जाए, जिन्हें न्यायालयों द्वारा परिभाषित किया जाता है।

उपाध्यक्ष महोदय : परंतुक में अपेक्षा की गई है कि ”नियम निश्चित है“।

पंडित ठाकुर दास भार्गव : यह निश्चित होना ही चाहिए, न कि अनुचित और इसमें कानून की शक्ति होनी चाहिए। परन्तु “और एकरूपता” और ”अथवा सार्वजनिक नीति के विरुद्ध“ शब्द न हों। मैं चाहता हूँ कि यही फेरबदल किया जाए।

उपाध्यक्ष महोदय : जहाँ मनुष्यों के सभी वर्गों के लिए एक प्रथा लागू होती है, तब इसे स्वभावतः........

पंडित ठाकुर दास भार्गव : मैं क्षमा चाहता हूँ। जब यह कहा जाता है कि एक ही प्रथा सभी मनुष्यों पर लागू होनी चाहिए तब इसे लगभग एक सार्वभौमिक नियम या कानून होना चाहिए। यह किसी जनजाति, सम्प्रदाय, समूह अथवा परिवार पर लागू होता है, जैसा कि यहां पर परिभाषित किया गया है। यदि आप कहते है “एकरूपता” तो इसका तात्पर्य होगा कि वह प्रथा जो किसी परिवार अथवा जाति अथवा सम्प्रदाय अथवा जनजाति पर लागू होती है, समाप्त हो जाएगी। जब “निरंतर“ शब्द है और जब “कानून” शब्द है, तब ”एकरूपता“ शब्द की आवश्यकता मेरी समझ में नहीं आती।

उपाध्यक्ष महोदय : मैं समझता हूँ कि “एकरूपता” शब्द से अभिप्रेत है किसी अन्तर के बिना।

डॉ. अम्बेडकर : बात यही है। मैं भी यही कहने जा रहा था।

पंडित ठाकुर दास भार्गव : अलग-अलग परिवारों में अलग-अलग रिवाज होते हैं। वे एक समान कैसे हो सकते हैं?

उपाध्यक्ष महोदय : बात माननीय सदस्य की समझ में नहीं आई है। हम यह कल्पना करेंगे कि कोई प्रथा है और वह लगातार चलती आ रही है, परन्तु इसमें बदलाव होता रहा है। मान लीजिए कि कोई व्यक्ति एक निश्चित समय में 10-10 रुपये एकत्र कर रहा है और अगली बार यह 15-15 रूपये हो गए और उसके बाद 20-20 रूपये हो गए; तो क्या यह कहा गया है कि इसकी प्रयुक्ति केवल प्रथा से ही नहीं, बल्कि कानून और पैसे से भी संबंधित होनी चाहिए? मान लीजिए कि न्यायालय के निर्णय में यह कहा जाता है कि इसमें एकरूपता नहीं थी। इसलिए, आप मानकर नहीं चल सकते। इसी प्रकार एकरूपता से तात्पर्य केवल जाति अथवा