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परिवार से जुड़ी एकरूपता से नहीं है, बल्कि परिवार में भी इसमें न केवल निरंतरता होनी चाहिए अपितु एक समान भी होनी चाहिए अर्थात् किसी अंतर के बिना।
डॉ. अम्बेडकर : इसका तात्पर्य यही है - किसी अंतर के बिना।
पंडित ठाकुर दास भार्गव : जैसे कि बदली हुई प्रथा कानून द्वारा मान्य नहीं होगी। यदि ऐसी प्रथा है जिसका पालन नहीं किया जा रहा है........
उपाध्यक्ष महोदय : जहाँ कहीं बदलाव हुआ है वह इतना सतत, इतने लम्बे समय तक और इतना निश्चित हुआ होना चाहिए कि........
पंडित ठाकुर दास भार्गव : ”निरंतर“ शब्द रखा गया है और मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं है। मुझे ”एकरूपता“ शब्द पर आपत्ति है।
उपाध्यक्ष महोदय : क्या श्री नजीरुद्दीन अहमद कोई खास संशोधन प्रस्तावित करना चाहते हैं? मुझे नहीं लगता।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : मैं “प्रथा” पर बोलना चाहता हूँ।
उपाध्यक्ष महोदय : पहले मैं उन्हे बुलाऊंगा, जिन्होंने संशोधन प्रस्तावित किए हैं। क्या श्री झुनझुनवाला अपने संशोधन पर कुछ कहना चाहते हैं? मैं उन्हे इसके लिए आमंत्रित करता हूँ।
श्री झुनझुनवाला : जी, हां। मैं बोलना चाहता हूँ। अपने संशोधन में मैं ”जनजाति“ के बाद “वर्ण” शब्द जोड़ना चाहता हूँ।
उपाध्यक्ष महोदय : वे यहां जातीय प्रथाओं को भी मान्यता देना चाहते हैं। वे विभिन्न वर्गां में ”जनजाति“ शब्द के बाद ”जाति“ भी जोड़ना चाहते हैं। उन्होंने इस आशय का प्रस्ताव भी पहले से प्रस्तुत किया है। अब वे शब्द का नामकरण ”जाति“ से बदलकर ”वर्ण“ करना चाहते हैं।
श्री झुनझुनवाला : मैं चाहता हूँ कि खंड 3( i ) में “जनजाति” शब्द के बाद ”वर्ण” शब्द आना चाहिए। इस संशोधन को प्रस्तुत करने का मेरा उद्देश्य यह है कि प्रथाओं और व्यवहारों को जहां क्षेत्र, जनजाति, सम्प्रदाय, समूह अथवा परिवार के अनुसार मान्यता प्रदान की जाएगी, वहीं ऐसे व्यवहारों और प्रथाओं को मान्यता देने के कारणों को माननीय डॉक्टर साहब ने स्पष्ट नहीं किया है। परन्तु यदि यह सिद्धांत स्वीकार कर लिया जाता है कि कतिपय प्रथाओं और व्यवहारों को मान्यता दी जाएगी, यदि, जैसा कि उन्होंने कहा है, ये प्रगतिशील सिद्ध होते हों, तो उस मामले में वर्णाश्रम धर्म के अनुसार विभिन्न वर्णां में प्रचलित प्रथाओं को मान्यता दी जानी चाहिए, यदि माननीय डॉ. साहब द्वारा निर्धारित शर्तों को पूरा किया जाता है।