462 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इस वर्णाश्रम धर्म का उद्गम हाल ही में नहीं हुआ है। लोगों का कहना है कि वर्ण, जातियां और ये सभी बातें पौराणिक काल से ही अस्तित्व में रही हैं। लेकिन यह तथ्य नहीं है। ये बातें बहुत पहले से, यो कहें कि 3000 वर्ष से भी पहले से अस्तित्व में रही हैं। इनका हमारे जीवन और सामाजिक ढांचे के साथ-साथ आर्थिक ढांचे के साथ गहरा संबंध है। चारों वर्णां में विभिन्न रूढि़यां और विभिन्न प्रथाएँ है और उनके पीछे अर्थ भी छिपा है। प्रत्येक रूढि़ और प्रथा का अपना अर्थ है और विभिन्न वर्णों को उनकी योग्यता के अनुसार कर्त्तव्यों का आवंटन किया गया है। एक दिन जब माननीय श्री गाडगिल से प्रश्न किया गया था कि क्या उन्होंने यज्ञोपवीत पहना हुआ है उन्हांने कहा था ”जी हां, मैंने यज्ञोपवीत पहना था”, फिर उन्होंने अपना कोट उतार कर कहा था ”देखिए, मैंने निकाल फेंका है”।
उपाध्यक्ष महोदय : उन्होंने अपना कोट नहीं उतारा था।
श्री झुनझुनवाला : मैं गलती सुधारता हूँ। उन्होंने अपना कोट पूरा नहीं उतारा था और उन्होने जो कारण बताया था, जिसे मैं महत्वपूर्ण समझता हूँ, वह यह था कि वे ब्राह्मण धर्म का अनुसरण करने में सक्षम नहीं हैं, जिसके लिए यज्ञोपवीत धारण किया जाता है, और उन्होंने कहा था ”इसीलिए एक ईमानदार व्यक्ति होने के नाते इसे निकाल फेंकना मैंने अपना कर्त्तव्य समझा था“। महोदय, यह दर्शाता है कि माननीय श्री गाडगिल भी इस व्यवहार की महानता और पवित्रता को और एक ब्राह्मण द्वारा विवाह से पूर्व यज्ञोपवीत धारण करने की पवित्रता को मानते हैं। इसी प्रकार अन्य वर्णां में भी ऐसी ही प्रथाएं हैं। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि विभिन्न वर्णों में प्रचलित सभी प्रथाओं को मान्यता दी जाए, यदि वे माननीय विधि मंत्री द्वारा निर्धारित शर्तों को पूरा करती हों। इसलिए यह संशोधन मैंने केवल इसी उद्देश्य से प्रस्तुत किया है कि विवाह, विवाह-विच्छेद अथवा किसी अन्य प्रथा के बारे में बाद में ऐसा कोई खंड आता है तो हम यह दिखाने की स्थिति में होंगे कि ये प्रथाएं चाहे किसी जनजाति अथवा सम्प्रदाय अथवा पारिवारिक समूह में प्रचलन में न हों, वे विभिन्न वर्णों में प्रचलित हैं और यह अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यही कारण है जिनके लिए मैं “वर्ण” शब्द जोड़ना चाहता हूँ।
श्री बी. के़ पी. सिन्हा (बिहार) : क्या मैं माननीय सदस्य से एक बात पूछ सकता
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हूँ। क्या उनका दावा यह है कि स्मृतियों और श्रुतियों का निरसन करते समय हमें प्रथाओं और व्यवहारों का निरसन नहीं करना चाहिए।
उपाध्यक्ष महोदय : श्रुतियों और स्मृतियों का निरसन नहीं किया गया है; उन्हें शामिल किया गया है।